बालकाण्ड · 45

धनुषभंग

बालकाण्ड का प्रकरण 45: धनुषभंग। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

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दोहा · 259

लखन लखेउ रघुबंसमनि ताकेउ हर कोदंडु। पुलकि गात बोले बचन चरन चापि ब्रह्मांडु॥259॥

चौपाई · 1

दिसिकुंजरहु कमठ अहि कोला। धरहु धरनि धरि धीर न डोला॥ रामु चहहिं संकर धनु तोरा। होहु सजग सुनि आयसु मोरा॥1॥

चौपाई · 2

चाप समीप रामु जब आए। नर नारिन्ह सुर सुकृत मनाए॥ सब कर संसउ अरु अग्यानू। मंद महीपन्ह कर अभिमानू॥2॥

चौपाई · 3

भृगुपति केरि गरब गरुआई। सुर मुनिबरन्ह केरि कदराई॥ सिय कर सोचु जनक पछितावा। रानिन्ह कर दारुन दुख दावा॥3॥

चौपाई · 4

संभुचाप बड़ बोहितु पाई। चढ़े जाइ सब संगु बनाई॥ राम बाहुबल सिंधु अपारू। चहत पारु नहिं कोउ कड़हारु॥4॥

दोहा · 260

राम बिलोके लोग सब चित्र लिखे से देखि। चितई सीय कृपायतन जानी बिकल बिसेषि॥260॥

चौपाई · 1

देखी बिपुल बिकल बैदेही। निमिष बिहात कलप सम तेही। तृषित बारि बिनु जो तनु त्यागा। मुएँ करइ का सुधा तड़ागा॥1॥

चौपाई · 2

का बरषा सब कृषी सुखानें। समय चुकें पुनि का पछितानें॥ अस जियँ जानि जानकी देखी। प्रभु पुलके लखि प्रीति बिसेषी॥2॥

चौपाई · 3

गुरहि प्रनामु मनहिं मन कीन्हा। अति लाघवँ उठाइ धनु लीन्हा॥ दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ। पुनि नभ धनु मंडल सम भयऊ॥3॥

चौपाई · 4

लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें। काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें॥ तेहि छन राम मध्य धनु तोरा। भरे भुवन धुनि घोर कठोरा॥4॥

छन्द

भे भुवन घोर कठोर रव रबि बाजि तजि मारगु चले। चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कूरुम कलमले॥ सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल बिकल बिचारहीं। कोदंड खंडेउ राम तुलसी जयति बचन उचारहीं॥

सोरठा · 261

संकर चापु जहाजु सागरु रघुबर बाहुबलु। बूड़ सो सकल समाजु चढ़ा जो प्रथमहिं मोह बस॥261॥

चौपाई · 1

प्रभु दोउ चापखंड महि डारे। देखि लोग सब भए सुखारे॥ कौसिकरूप पयोनिधि पावन। प्रेम बारि अवगाहु सुहावन॥1॥

चौपाई · 2

रामरूप राकेसु निहारी। बढ़त बीचि पुलकावलि भारी॥ बाजे नभ गहगहे निसाना। देवबधू नाचहिं करि गाना॥2॥

चौपाई · 3

ब्रह्मादिक सुर सिद्ध मुनीसा। प्रभुहि प्रसंसहिं देहिं असीसा॥ बरिसहिं सुमन रंग बहु माला। गावहिं किंनर गीत रसाला॥3॥

चौपाई · 4

रही भुवन भरि जय जय बानी। धनुषभंग धुनिजात न जानी॥ मुदित कहहिं जहँ तहँ नर नारी। भंजेउ राम संभुधनु भारी॥4॥

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गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।