बालकाण्ड · 38
श्री राम-लक्ष्मण का जनकपुर निरीक्षण
बालकाण्ड का प्रकरण 38: श्री राम-लक्ष्मण का जनकपुर निरीक्षण। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
चौपाई · 1
लखन हृदयँ लालसा बिसेषी। जाइ जनकपुर आइअ देखी॥ प्रभु भय बहुरि मुनिहि सकुचाहीं। प्रगट न कहहिं मनहिं मुसुकाहीं॥1॥
चौपाई · 2
राम अनुज मन की गति जानी। भगत बछलता हियँ हुलसानी॥ परम बिनीत सकुचि मुसुकाई। बोले गुर अनुसासन पाई॥2॥
चौपाई · 3
नाथ लखनु पुरु देखन चहहीं। प्रभु सकोच डर प्रगट न कहहीं॥ जौं राउर आयसु मैं पावौं। नगर देखाइ तुरत लै आवौं॥3॥
चौपाई · 4
सुनि मुनीसु कह बचन सप्रीती। कस न राम तुम्ह राखहु नीती॥ धरम सेतु पालक तुम्ह ताता। प्रेम बिबस सेवक सुखदाता॥4॥
दोहा · 218
जाइ देखि आवहु नगरु सुख निधान दोउ भाइ। करहु सुफल सब के नयन सुंदर बदन देखाइ॥218॥
चौपाई · 1
मुनि पद कमल बंदि दोउ भ्राता। चले लोक लोचन सुख दाता॥ बालक बृंद देखि अति सोभा। लगे संग लोचन मनु लोभा॥1॥
चौपाई · 2
पीत बसन परिकर कटि भाथा। चारु चाप सर सोहत हाथा॥ तन अनुहरत सुचंदन खोरी। स्यामल गौर मनोहर जोरी॥2॥
चौपाई · 3
केहरि कंधर बाहु बिसाला। उर अति रुचिर नागमनि माला॥ सुभग सोन सरसीरुह लोचन। बदन मयंक तापत्रय मोचन॥3॥
चौपाई · 4
कानन्हि कनक फूल छबि देहीं। चितवत चितहि चोरि जनु लेहीं॥ चितवनि चारु भृकुटि बर बाँकी। तिलक रेख सोभा जनु चाँकी॥4॥
दोहा · 219
रुचिर चौतनीं सुभग सिर मेचक कुंचित केस। नख सिख सुंदर बंधु दोउ सोभा सकल सुदेस॥219॥
चौपाई · 1
देखन नगरु भूपसुत आए। समाचार पुरबासिन्ह पाए॥ धाए धाम काम सब त्यागी। मनहुँ रंक निधि लूटन लागी॥1॥
चौपाई · 2
निरखि सहज सुंदर दोउ भाई। होहिं सुखी लोचन फल पाई॥ जुबतीं भवन झरोखन्हि लागीं। निरखहिं राम रूप अनुरागीं॥2॥
चौपाई · 3
कहहिं परसपर बचन सप्रीती। सखि इन्ह कोटि काम छबि जीती॥ सुर नर असुर नाग मुनि माहीं। सोभा असि कहुँ सुनिअति नाहीं॥3॥
चौपाई · 4
बिष्नु चारि भुज बिधि मुख चारी। बिकट बेष मुख पंच पुरारी॥ अपर देउ अस कोउ ना आही। यह छबि सखी पटतरिअ जाही॥4॥
दोहा · 220
बय किसोर सुषमा सदन स्याम गौर सुख धाम। अंग अंग पर वारिअहिं कोटि कोटि सत काम॥220॥
चौपाई · 1
कहहु सखी अस को तनु धारी। जो न मोह यह रूप निहारी॥ कोउ सप्रेम बोली मृदु बानी। जो मैं सुना सो सुनहु सयानी॥1॥
चौपाई · 2
ए दोऊ दसरथ के ढोटा। बाल मरालन्हि के कल जोटा॥ मुनि कौसिक मख के रखवारे। जिन्ह रन अजिर निसाचर मारे॥2॥
चौपाई · 3
स्याम गात कल कंज बिलोचन। जो मारीच सुभुज मदु मोचन॥ कौसल्या सुत सो सुख खानी। नामु रामु धनु सायक पानी॥3॥
चौपाई · 4
गौर किसोर बेषु बर काछें। कर सर चाप राम के पाछें॥ लछिमनु नामु राम लघु भ्राता। सुनु सखि तासु सुमित्रा माता॥4॥
दोहा · 221
बिप्रकाजु करि बंधु दोउ मग मुनिबधू उधारि। आए देखन चापमख सुनि हरषीं सब नारि॥221॥
चौपाई · 1
देखि राम छबि कोउ एक कहई। जोगु जानकिहि यह बरु अहई॥ जौं सखि इन्हहि देख नरनाहू। पन परिहरि हठि करइ बिबाहू॥1॥
चौपाई · 2
कोउ कह ए भूपति पहिचाने। मुनि समेत सादर सनमाने॥ सखि परंतु पनु राउ न तजई। बिधि बस हठि अबिबेकहि भजई॥2॥
चौपाई · 3
कोउ कह जौं भल अहइ बिधाता। सब कहँ सुनिअ उचित फल दाता॥ तौ जानकिहि मिलिहि बरु एहू। नाहिन आलि इहाँ संदेहू॥3॥
चौपाई · 4
जौं बिधि बस अस बनै सँजोगू। तौ कृतकृत्य होइ सब लोगू॥ सखि हमरें आरति अति तातें। कबहुँक ए आवहिं एहि नातें॥4॥
दोहा · 222
नाहिं त हम कहुँ सुनहु सखि इन्ह कर दरसनु दूरि। यह संघटु तब होइ जब पुन्य पुराकृत भूरि॥222॥
चौपाई · 1
बोली अपर कहेहु सखि नीका। एहिं बिआह अति हित सबही का। कोउ कह संकर चाप कठोरा। ए स्यामल मृदु गात किसोरा॥1॥
चौपाई · 2
सबु असमंजस अहइ सयानी। यह सुनि अपर कहइ मृदु बानी॥ सखि इन्ह कहँ कोउ कोउ अस कहहीं। बड़ प्रभाउ देखत लघु अहहीं॥2॥
चौपाई · 3
परसि जासु पद पंकज धूरी। तरी अहल्या कृत अघ भूरी॥ सो कि रहिहि बिनु सिव धनु तोरें। यह प्रतीति परिहरिअ न भोरें॥3॥
चौपाई · 4
जेहिं बिरंचि रचि सीय सँवारी। तेहिं स्यामल बरु रचेउ बिचारी॥ तासु बचन सुनि सब हरषानीं। ऐसेइ होउ कहहिं मृदु बानीं॥4॥
दोहा · 223
हियँ हरषहिं बरषहिं सुमन सुमुखि सुलोचनि बृंद। जाहिं जहाँ जहँ बंधु दोउ तहँ तहँ परमानंद॥223॥
चौपाई · 1
पुर पूरब दिसि गे दोउ भाई। जहँ धनुमख हित भूमि बनाई॥ अति बिस्तार चारु गच ढारी। बिमल बेदिका रुचिर सँवारी॥1॥
चौपाई · 2
चहुँ दिसि कंचन मंच बिसाला। रचे जहाँ बैठहिं महिपाला॥ तेहि पाछें समीप चहुँ पासा। अपर मंच मंडली बिलासा॥2॥
चौपाई · 3
कछुक ऊँचि सब भाँति सुहाई। बैठहिं नगर लोग जहँ जाई॥ तिन्ह के निकट बिसाल सुहाए। धवल धाम बहुबरन बनाए॥3॥
चौपाई · 4
जहँ बैठें देखहिं सब नारी। जथाजोगु निज कुल अनुहारी॥ पुर बालक कहि कहि मृदु बचना। सादर प्रभुहि देखावहिं रचना॥4॥
दोहा · 224
सब सिसु एहि मिस प्रेमबस परसि मनोहर गात। तन पुलकहिं अति हरषु हियँ देखि देखि दोउ भ्रात॥224॥
चौपाई · 1
सिसु सब राम प्रेमबस जाने। प्रीति समेत निकेत बखाने॥ निज निज रुचि सब लेहिं बोलाई। सहित सनेह जाहिं दोउ भाई॥1॥
चौपाई · 2
राम देखावहिं अनुजहि रचना। कहि मृदु मधुर मनोहर बचना॥ लव निमेष महुँ भुवन निकाया। रचइ जासु अनुसासन माया॥2॥
चौपाई · 3
भगति हेतु सोइ दीनदयाला। चितवत चकित धनुष मखसाला॥ कौतुक देखि चले गुरु पाहीं। जानि बिलंबु त्रास मन माहीं॥3॥
चौपाई · 4
जासु त्रास डर कहुँ डर होई। भजन प्रभाउ देखावत सोई॥ कहि बातें मृदु मधुर सुहाईं। किए बिदा बालक बरिआईं॥4॥
दोहा · 225
सभय सप्रेम बिनीत अति सकुच सहित दोउ भाइ। गुर पद पंकज नाइ सिर बैठे आयसु पाइ॥225॥
चौपाई · 1
निसि प्रबेस मुनि आयसु दीन्हा। सबहीं संध्याबंदनु कीन्हा॥ कहत कथा इतिहास पुरानी। रुचिर रजनि जुग जाम सिरानी॥1॥
चौपाई · 2
मुनिबर सयन कीन्हि तब जाई। लगे चरन चापन दोउ भाई॥ जिन्ह के चरन सरोरुह लागी। करत बिबिध जप जोग बिरागी॥2॥
चौपाई · 3
तेइ दोउ बंधु प्रेम जनु जीते। गुर पद कमल पलोटत प्रीते॥ बार बार मुनि अग्या दीन्ही। रघुबर जाइ सयन तब कीन्ही॥3॥
चौपाई · 4
चापत चरन लखनु उर लाएँ। सभय सप्रेम परम सचु पाएँ॥ पुनि पुनि प्रभु कह सोवहु ताता। पौढ़े धरि उर पद जलजाता॥4॥
दोहा · 226
उठे लखनु निसि बिगत सुनि अरुनसिखा धुनि कान। गुर तें पहिलेहिं जगतपति जागे रामु सुजान॥226॥
चौपाई · 1
सकल सौच करि जाइ नहाए। नित्य निबाहि मुनिहि सिर नाए॥ समय जानि गुर आयसु पाई। लेन प्रसून चले दोउ भाई॥1॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।