बालकाण्ड · 33
श्री भगवान् का प्राकट्य और बाललीला का आनंद
बालकाण्ड का प्रकरण 33: श्री भगवान् का प्राकट्य और बाललीला का आनंद। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 189
तब अदृस्य भए पावक सकल सभहि समुझाइ। परमानंद मगन नृप हरष न हृदयँ समाइ॥189॥
चौपाई · 1
तबहिं रायँ प्रिय नारि बोलाईं। कौसल्यादि तहाँ चलि आईं॥ अर्ध भाग कौसल्यहि दीन्हा। उभय भाग आधे कर कीन्हा॥1॥
चौपाई · 2
कैकेई कहँ नृप सो दयऊ। रह्यो सो उभय भाग पुनि भयऊ॥ कौसल्या कैकेई हाथ धरि। दीन्ह सुमित्रहि मन प्रसन्न करि॥2॥
चौपाई · 3
एहि बिधि गर्भसहित सब नारी। भईं हृदयँ हरषित सुख भारी॥ जा दिन तें हरि गर्भहिं आए। सकल लोक सुख संपति छाए॥3॥
चौपाई · 4
मंदिर महँ सब राजहिं रानीं। सोभा सील तेज की खानीं॥ सुख जुत कछुक काल चलि गयऊ। जेहिं प्रभु प्रगट सो अवसर भयऊ॥4॥
दोहा · 190
जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल। चर अरु अचर हर्षजुत राम जनम सुखमूल॥190॥
चौपाई · 1
नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता॥ मध्यदिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक बिश्रामा॥1॥
चौपाई · 2
सीतल मंद सुरभि बह बाऊ। हरषित सुर संतन मन चाऊ॥ बन कुसुमित गिरिगन मनिआरा। स्रवहिं सकल सरिताऽमृतधारा॥2॥
चौपाई · 3
सो अवसर बिरंचि जब जाना। चले सकल सुर साजि बिमाना॥ गगन बिमल संकुल सुर जूथा। गावहिं गुन गंधर्ब बरुथा॥3॥
चौपाई · 4
बरषहिं सुमन सुअंजुलि साजी। गहगहि गगन दुंदुभी बाजी॥ अस्तुति करहिं नाग मुनि देवा। बहुबिधि लावहिं निज निज सेवा॥4॥
दोहा · 191
सुर समूह बिनती करि पहुँचे निज निज धाम। जगनिवास प्रभु प्रगटे अखिल लोक बिश्राम॥191
छन्द · 1
भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी। हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥ लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुजचारी। भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी॥1॥
छन्द · 2
कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता। माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता॥ करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता। सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता॥2॥
छन्द · 3
ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै। मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै॥ उपजा जब ग्याना प्रभु मुसुकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै। कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै॥3॥
छन्द · 4
माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा। कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा॥ सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा। यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा॥4॥
दोहा · 192
बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार। निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार॥192॥
चौपाई · 1
सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी। संभ्रम चलि आईं सब रानी॥ हरषित जहँ तहँ धाईं दासी। आनँद मगन सकल पुरबासी॥1॥
चौपाई · 2
दसरथ पुत्रजन्म सुनि काना। मानहु ब्रह्मानंद समाना॥ परम प्रेम मन पुलक सरीरा। चाहत उठन करत मति धीरा॥2॥
चौपाई · 3
जाकर नाम सुनत सुभ होई। मोरें गृह आवा प्रभु सोई॥ परमानंद पूरि मन राजा। कहा बोलाइ बजावहु बाजा॥3॥
चौपाई · 4
गुर बसिष्ठ कहँ गयउ हँकारा। आए द्विजन सहित नृपद्वारा॥ अनुपम बालक देखेन्हि जाई। रूप रासि गुन कहि न सिराई॥4॥
दोहा · 193
नंदीमुख सराध करि जातकरम सब कीन्ह। हाटक धेनु बसन मनि नृप बिप्रन्ह कहँ दीन्ह॥193॥
चौपाई · 1
ध्वज पताक तोरन पुर छावा। कहि न जाइ जेहि भाँति बनावा॥ सुमनबृष्टि अकास तें होई। ब्रह्मानंद मगन सब लोई॥1॥
चौपाई · 2
बृंद बृंद मिलि चलीं लोगाईं। सहज सिंगार किएँ उठि धाईं॥ कनक कलस मंगल भरि थारा। गावत पैठहिं भूप दुआरा॥2॥
चौपाई · 3
करि आरति नेवछावरि करहीं। बार बार सिसु चरनन्हि परहीं॥ मागध सूत बंदिगन गायक। पावन गुन गावहिं रघुनायक॥3॥
चौपाई · 4
सर्बस दान दीन्ह सब काहू। जेहिं पावा राखा नहिं ताहू॥ मृगमद चंदन कुंकुम कीचा। मची सकल बीथिन्ह बिच बीचा॥4॥
दोहा · 194
गृह गृह बाज बधाव सुभ प्रगटे सुषमा कंद। हरषवंत सब जहँ तहँ नगर नारि नर बृंद॥194॥
चौपाई · 1
कैकयसुता सुमित्रा दोऊ। सुंदर सुत जनमत भैं ओऊ॥ वह सुख संपति समय समाजा। कहि न सकइ सारद अहिराजा॥1॥
चौपाई · 2
अवधपुरी सोहइ एहि भाँती। प्रभुहि मिलन आई जनु राती॥ देखि भानु जनु मन सकुचानी। तदपि बनी संध्या अनुमानी॥2॥
चौपाई · 3
अगर धूप बहु जनु अँधिआरी। उड़इ अबीर मनहुँ अरुनारी॥ मंदिर मनि समूह जनु तारा। नृप गृह कलस सो इंदु उदारा॥3॥
चौपाई · 4
भवन बेदधुनि अति मृदु बानी। जनु खग मुखर समयँ जनु सानी॥ कौतुक देखि पतंग भुलाना। एक मास तेइँ जात न जाना॥4॥
दोहा · 195
मास दिवस कर दिवस भा मरम न जानइ कोइ। रथ समेत रबि थाकेउ निसा कवन बिधि होइ॥195॥
चौपाई · 1
यह रहस्य काहूँ नहिं जाना। दिनमनि चले करत गुनगाना॥ देखि महोत्सव सुर मुनि नागा। चले भवन बरनत निज भागा॥1॥
चौपाई · 2
औरउ एक कहउँ निज चोरी। सुनु गिरिजा अति दृढ़ मति तोरी॥ काकभुसुंडि संग हम दोऊ। मनुजरूप जानइ नहिं कोऊ॥2॥
चौपाई · 3
परमानंद प्रेम सुख फूले। बीथिन्ह फिरहिं मगन मन भूले॥ यह सुभ चरित जान पै सोई। कृपा राम कै जापर होई॥3॥
चौपाई · 4
तेहि अवसर जो जेहि बिधि आवा। दीन्ह भूप जो जेहि मन भावा॥ गज रथ तुरग हेम गो हीरा। दीन्हे नृप नानाबिधि चीरा॥4॥
दोहा · 196
मन संतोषे सबन्हि के जहँ तहँ देहिं असीस। सकल तनय चिर जीवहुँ तुलसिदास के ईस॥196॥
चौपाई · 1
कछुक दिवस बीते एहि भाँती। जात न जानिअ दिन अरु राती॥ नामकरन कर अवसरु जानी। भूप बोलि पठए मुनि ग्यानी॥1॥
चौपाई · 2
करि पूजा भूपति अस भाषा। धरिअ नाम जो मुनि गुनि राखा॥ इन्ह के नाम अनेक अनूपा। मैं नृप कहब स्वमति अनुरुपा॥2॥
चौपाई · 3
जो आनंद सिंधु सुखरासी। सीकर तें त्रैलोक सुपासी॥ सो सुखधाम राम अस नामा। अखिल लोक दायक बिश्रामा॥3॥
चौपाई · 4
बिस्व भरन पोषन कर जोई। ताकर नाम भरत अस होई॥ जाके सुमिरन तें रिपु नासा। नाम सत्रुहन बेद प्रकासा॥4॥
दोहा · 197
लच्छन धाम राम प्रिय सकल जगत आधार। गुरु बसिष्ठ तेहि राखा लछिमन नाम उदार॥197॥
चौपाई · 1
धरे नाम गुर हृदयँ बिचारी। बेद तत्व नृप तव सुत चारी॥ मुनि धन जन सरबस सिव प्राना। बाल केलि रस तेहिं सुख माना॥1॥
चौपाई · 2
बारेहि ते निज हित पति जानी। लछिमन राम चरन रति मानी॥ भरत सत्रुहन दूनउ भाई। प्रभु सेवक जसि प्रीति बड़ाई॥2॥
चौपाई · 3
स्याम गौर सुंदर दोउ जोरी। निरखहिं छबि जननीं तृन तोरी॥ चारिउ सील रूप गुन धामा। तदपि अधिक सुखसागर रामा॥3॥
चौपाई · 4
हृदयँ अनुग्रह इंदु प्रकासा। सूचत किरन मनोहर हासा॥ कबहुँ उछंग कबहुँ बर पलना। मातु दुलारइ कहि प्रिय ललना॥4॥
दोहा · 198
ब्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुन बिगत बिनोद। सो अज प्रेम भगति बस कौसल्या कें गोद॥198॥
चौपाई · 1
काम कोटि छबि स्याम सरीरा। नील कंज बारिद गंभीरा॥ अरुन चरन पंकज नख जोती। कमल दलन्हि बैठे जनु मोती॥1॥
चौपाई · 2
रेख कुलिस ध्वज अंकुस सोहे। नूपुर धुनि सुनि मुनि मन मोहे॥ कटि किंकिनी उदर त्रय रेखा। नाभि गभीर जान जेहिं देखा॥2॥
चौपाई · 3
भुज बिसाल भूषन जुत भूरी। हियँ हरि नख अति सोभा रूरी॥ उर मनिहार पदिक की सोभा। बिप्र चरन देखत मन लोभा॥3॥
चौपाई · 4
कंबु कंठ अति चिबुक सुहाई। आनन अमित मदन छबि छाई॥ दुइ दुइ दसन अधर अरुनारे। नासा तिलक को बरनै पारे॥4॥
चौपाई · 5
सुंदर श्रवन सुचारु कपोला। अति प्रिय मधुर तोतरे बोला॥ चिक्कन कच कुंचित गभुआरे। बहु प्रकार रचि मातु सँवारे॥5॥
चौपाई · 6
पीत झगुलिआ तनु पहिराई। जानु पानि बिचरनि मोहि भाई॥ रूप सकहिं नहिं कहि श्रुति सेषा। सो जानइ सपनेहुँ जेहिं देखा॥6॥
दोहा · 199
सुख संदोह मोह पर ग्यान गिरा गोतीत। दंपति परम प्रेम बस कर सिसुचरित पुनीत॥199॥
चौपाई · 1
एहि बिधि राम जगत पितु माता। कोसलपुर बासिन्ह सुखदाता॥ जिन्ह रघुनाथ चरन रति मानी। तिन्ह की यह गति प्रगट भवानी॥1॥
चौपाई · 2
रघुपति बिमुख जतन कर कोरी। कवन सकइ भव बंधन छोरी॥ जीव चराचर बस कै राखे। सो माया प्रभु सों भय भाखे॥2॥
चौपाई · 3
भृकुटि बिलास नचावइ ताही। अस प्रभु छाड़ि भजिअ कहु काही॥ मन क्रम बचन छाड़ि चतुराई। भजत कृपा करिहहिं रघुराई॥3॥
चौपाई · 4
एहि बिधि सिसुबिनोद प्रभु कीन्हा। सकल नगरबासिन्ह सुख दीन्हा॥ लै उछंग कबहुँक हलरावै। कबहुँ पालने घालि झुलावै॥4॥
दोहा · 200
प्रेम मगन कौसल्या निसि दिन जात न जान। सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान॥200॥
चौपाई · 1
एक बार जननीं अन्हवाए। करि सिंगार पलनाँ पौढ़ाए॥ निज कुल इष्टदेव भगवाना। पूजा हेतु कीन्ह अस्नाना॥1॥
चौपाई · 2
करि पूजा नैबेद्य चढ़ावा। आपु गई जहँ पाक बनावा॥ बहुरि मातु तहवाँ चलि आई। भोजन करत देख सुत जाई॥2॥
चौपाई · 3
गै जननी सिसु पहिं भयभीता। देखा बाल तहाँ पुनि सूता॥ बहुरि आइ देखा सुत सोई। हृदयँ कंप मन धीर न होई॥3॥
चौपाई · 4
इहाँ उहाँ दुइ बालक देखा। मतिभ्रम मोर कि आन बिसेषा॥ देखि राम जननी अकुलानी। प्रभु हँसि दीन्ह मधुर मुसुकानी॥4॥
दोहा · 201
देखरावा मातहि निज अद्भुत रूप अखंड। रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड॥201॥
चौपाई · 1
अगनित रबि ससि सिव चतुरानन। बहु गिरि सरित सिंधु महि कानन॥ काल कर्म गुन ग्यान सुभाऊ। सोउ देखा जो सुना न काऊ॥1॥
चौपाई · 2
देखी माया सब बिधि गाढ़ी। अति सभीत जोरें कर ठाढ़ी॥ देखा जीव नचावइ जाही। देखी भगति जो छोरइ ताही॥2॥
चौपाई · 3
तन पुलकित मुख बचन न आवा। नयन मूदि चरननि सिरु नावा॥ बिसमयवंत देखि महतारी। भए बहुरि सिसुरूप खरारी॥3॥
चौपाई · 4
अस्तुति करि न जाइ भय माना। जगत पिता मैं सुत करि जाना॥ हरि जननी बहुबिधि समुझाई। यह जनि कतहुँ कहसि सुनु माई॥4॥
दोहा · 202
बार बार कौसल्या बिनय करइ कर जोरि। अब जनि कबहूँ ब्यापै प्रभु मोहि माया तोरि॥202॥
चौपाई · 1
बालचरित हरि बहुबिधि कीन्हा। अति अनंद दासन्ह कहँ दीन्हा॥ कछुक काल बीतें सब भाई। बड़े भए परिजन सुखदाई॥1॥
चौपाई · 2
चूड़ाकरन कीन्ह गुरु जाई। बिप्रन्ह पुनि दछिना बहु पाई॥ परम मनोहर चरित अपारा। करत फिरत चारिउ सुकुमारा॥2॥
चौपाई · 3
मन क्रम बचन अगोचर जोई। दसरथ अजिर बिचर प्रभु सोई॥ भोजन करत बोल जब राजा। नहिं आवत तजि बाल समाजा॥3॥
चौपाई · 4
कौसल्या जब बोलन जाई। ठुमुकु ठुमुकु प्रभु चलहिं पराई॥ निगम नेति सिव अंत न पावा। ताहि धरै जननी हठि धावा॥4॥
चौपाई · 5
धूसर धूरि भरें तनु आए। भूपति बिहसि गोद बैठाए॥5॥
दोहा · 203
भोजन करत चपल चित इत उत अवसरु पाइ। भाजि चले किलकत मुख दधि ओदन लपटाइ॥203॥
चौपाई · 1
बालचरित अति सरल सुहाए। सारद सेष संभु श्रुति गाए॥ जिन्ह कर मन इन्ह सन नहिं राता। ते जन बंचित किए बिधाता॥1॥
चौपाई · 2
भए कुमार जबहिं सब भ्राता। दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता॥ गुरगृहँ गए पढ़न रघुराई। अलप काल बिद्या सब आई॥2॥
चौपाई · 3
जाकी सहज स्वास श्रुति चारी। सो हरि पढ़ यह कौतुक भारी॥ बिद्या बिनय निपुन गुन सीला। खेलहिंखेल सकल नृपलीला॥3॥
चौपाई · 4
करतल बान धनुष अति सोहा। देखत रूप चराचर मोहा॥ जिन्ह बीथिन्ह बिहरहिं सब भाई। थकित होहिं सब लोग लुगाई॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।