अयोध्याकाण्ड · 48
भरतजी का अयोध्या लौटना, भरतजी द्वारा पादुका की स्थापना, नन्दिग्राम में निवास और श्री भरतजी के चरित्र श्रवण की महिमा
अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 48: भरतजी का अयोध्या लौटना, भरतजी द्वारा पादुका की स्थापना, नन्दिग्राम में निवास और श्री भरतजी के चरित्र श्रवण की महिमा। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 321
सानुज सीय समेत प्रभु राजत परन कुटीर। भगति ग्यानु बैराग्य जनु सोहत धरें सरीर॥321॥
चौपाई · 1
मुनि महिसुर गुर भरत भुआलू। राम बिरहँ सबु साजु बिहालू। प्रभु गुन ग्राम गनत मन माहीं। सब चुपचाप चले मग जाहीं॥1॥
चौपाई · 2
जमुना उतरि पार सबु भयऊ। सो बासरु बिनु भोजन गयऊ॥ उतरि देवसरि दूसर बासू। रामसखाँ सब कीन्ह सुपासू॥2॥
चौपाई · 3
सई उतरि गोमतीं नहाए। चौथें दिवस अवधपुर आए॥ जनकु रहे पुर बासर चारी। राज काज सब साज सँभारी॥3॥
चौपाई · 4
सौंपि सचिव गुर भरतहिं राजू। तेरहुति चले साजि सबु साजू॥ नगर नारि नर गुर सिख मानी। बसे सुखेन राम रजधानी॥4॥
दोहा · 322
राम दरस लगि लोग सब करत नेम उपबास। तजि तजि भूषन भोग सुख जिअत अवधि कीं आस॥322॥
चौपाई · 1
सचिव सुसेवक भरत प्रबोधे। निज निज काज पाइ सिख ओधे॥ पुनि सिख दीन्हि बोलि लघु भाई। सौंपी सकल मातु सेवकाई॥1॥
चौपाई · 2
भूसुर बोलि भरत कर जोरे। करि प्रनाम बय बिनय निहोरे॥ ऊँच नीच कारजु भल पोचू। आयसु देब न करब सँकोचू॥2॥
चौपाई · 3
परिजन पुरजन प्रजा बोलाए। समाधानु करि सुबस बसाए॥ सानुज गे गुर गेहँ बहोरी। करि दंडवत कहत कर जोरी॥3॥
चौपाई · 4
आयसु होइ त रहौं सनेमा। बोले मुनि तन पुलकि सपेमा॥ समुझब कहब करब तुम्ह जोई। धरम सारु जग होइहि सोई॥4॥
दोहा · 323
सुनि सिख पाइ असीस बड़ि गनक बोलि दिनु साधि। सिंघासन प्रभु पादुका बैठारे निरुपाधि॥323॥
चौपाई · 1
राम मातु गुर पद सिरु नाई। प्रभु पद पीठ रजायसु पाई॥ नंदिगाँव करि परन कुटीरा। कीन्ह निवासु धरम धुर धीरा॥1॥
चौपाई · 2
जटाजूट सिर मुनिपट धारी। महि खनि कुस साँथरी सँवारी॥ असन बसन बासन ब्रत नेमा। करत कठिन रिषिधरम सप्रेमा॥2॥
चौपाई · 3
भूषन बसन भोग सुख भूरी। मन तन बचन तजे तिन तूरी॥ अवध राजु सुर राजु सिहाई। दसरथ धनु सुनि धनदु लजाई॥3॥
चौपाई · 4
तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा। चंचरीक जिमि चंपक बागा॥ रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी॥4॥
दोहा · 324
राम प्रेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति। चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति॥324॥
चौपाई · 1
देह दिनहुँ दिन दूबरि होई। घटइ तेजु बलु मुखछबि सोई॥ नित नव राम प्रेम पनु पीना। बढ़त धरम दलु मनु न मलीना॥1॥
चौपाई · 2
जिमि जलु निघटत सरद प्रकासे। बिलसत बेतस बनज बिकासे॥ सम दम संजम नियम उपासा। नखत भरत हिय बिमल अकासा॥2॥
चौपाई · 3
ध्रुव बिस्वासु अवधि राका सी। स्वामि सुरति सुरबीथि बिकासी॥ राम पेम बिधु अचल अदोषा। सहित समाज सोह नित चोखा॥3॥
चौपाई · 4
भरत रहनि समुझनि करतूती। भगति बिरति गुन बिमल बिभूती॥ बरनत सकल सुकबि सकुचाहीं। सेस गनेस गिरा गमु नाहीं॥4॥
दोहा · 325
नित पूजत प्रभु पाँवरी प्रीति न हृदयँ समाति। मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति॥325॥
चौपाई · 1
पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू। जीह नामु जप लोचन नीरू॥ लखन राम सिय कानन बसहीं। भरतु भवन बसि तप तनु कसहीं॥1॥
चौपाई · 2
दोउ दिसि समुझि कहत सबु लोगू। सब बिधि भरत सराहन जोगू॥ सुनि ब्रत नेम साधु सकुचाहीं। देखि दसा मुनिराज लजाहीं॥2॥
चौपाई · 3
परम पुनीत भरत आचरनू। मधुर मंजु मुद मंगल करनू॥ हरन कठिन कलि कलुष कलेसू। महामोह निसि दलन दिनेसू॥3॥
चौपाई · 4
पाप पुंज कुंजर मृगराजू। समन सकल संताप समाजू॥ जन रंजन भंजन भव भारू। राम सनेह सुधाकर सारू॥4॥
छन्द
सिय राम प्रेम पियूष पूरन होत जनमु न भरत को। मुनि मन अगम जम नियम सम दम बिषम ब्रत आचरत को॥ दुख दाह दारिद दंभ दूषन सुजस मिस अपहरत को। कलिकाल तुलसी से सठन्हि हठि राम सनमुख करत को॥
सोरठा · 326
भरत चरित करि नेमु तुलसी जो सादर सुनहिं। सीय राम पद पेमु अवसि होइ भव रस बिरति॥326॥
सोरठा
इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने द्वितीयः सोपानः समाप्तः।
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।