अयोध्याकाण्ड · 35
श्री सीताजी का स्वप्न, भरतजी के आगमन की सूचना, रामजी का शोक, लक्ष्मणजी का क्रोध
अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 35: श्री सीताजी का स्वप्न, भरतजी के आगमन की सूचना, रामजी का शोक, लक्ष्मणजी का क्रोध। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 225
भरत प्रेमु तेहि समय जस तस कहि सकइ न सेषु। कबिहि अगम जिमि ब्रह्मसुखु अह मम मलिन जनेषु॥225॥
चौपाई · 1
सकल सनेह सिथिल रघुबर कें। गए कोस दुइ दिनकर ढरकें॥ जलु थलु देखि बसे निसि बीतें। कीन्ह गवन रघुनाथ पिरीतें॥1॥
चौपाई · 2
उहाँ रामु रजनी अवसेषा। जागे सीयँ सपन अस देखा॥ सहित समाज भरत जनु आए। नाथ बियोग ताप तन ताए॥2॥
चौपाई · 3
सकल मलिन मन दीन दुखारी। देखीं सासु आन अनुहारी॥ सुनि सिय सपन भरे जल लोचन। भए सोचबस सोच बिमोचन॥3॥
चौपाई · 4
लखन सपन यह नीक न होई। कठिन कुचाह सुनाइहि कोई॥ अस कहि बंधु समेत नहाने पूजि पुरारि साधु सनमाने॥4॥
छन्द
सनमानि सुर मुनि बंदि बैठे उतर दिसि देखत भए। नभ धूरि खग मृग भूरि भागे बिकल प्रभु आश्रम गए॥ तुलसी उठे अवलोकि कारनु काह चित सचकित रहे। सब समाचार किरात कोलन्हि आइ तेहि अवसर कहे॥
सोरठा · 226
सुनत सुमंगल बैन मन प्रमोद तन पुलक भर। सरद सरोरुह नैन तुलसी भरे सनेह जल॥226॥
चौपाई · 1
बहुरि सोचबस भे सियरवनू। कारन कवन भरत आगवनू॥ एक आइ अस कहा बहोरी। सेन संग चतुरंग न थोरी॥1॥
चौपाई · 2
सो सुनि रामहि भा अति सोचू। इत पितु बच इत बंधु सकोचू॥ भरत सुभाउ समुझि मन माहीं। प्रभु चित हित थिति पावत नाहीं॥2॥
चौपाई · 3
समाधान तब भा यह जाने। भरतु कहे महुँ साधु सयाने॥ लखन लखेउ प्रभु हृदयँ खभारू। कहत समय सम नीति बिचारू॥3॥
चौपाई · 4
बिनु पूछें कछु कहउँ गोसाईं। सेवकु समयँ न ढीठ ढिठाईं॥ तुम्ह सर्बग्य सिरोमनि स्वामी। आपनि समुझि कहउँ अनुगामी॥4॥
दोहा · 227
नाथ सुहृद सुठि सरल चित सील सनेह निधान। सब पर प्रीति प्रतीति जियँ जानिअ आपु समान॥227॥
चौपाई · 1
बिषई जीव पाइ प्रभुताई। मूढ़ मोह बस होहिं जनाई॥ भरतु नीति रत साधु सुजाना। प्रभु पद प्रेमु सकल जगु जाना॥1॥
चौपाई · 2
तेऊ आजु राम पदु पाई। चले धरम मरजाद मेटाई॥ कुटिल कुबंधु कुअवसरु ताकी। जानि राम बनबास एकाकी॥2॥
चौपाई · 3
करि कुमंत्रु मन साजि समाजू। आए करै अकंटक राजू॥ कोटि प्रकार कलपि कुटिलाई। आए दल बटोरि दोउ भाई॥3॥
चौपाई · 4
जौं जियँ होति न कपट कुचाली। केहि सोहाति रथ बाजि गजाली॥ भरतहि दोसु देइ को जाएँ। जग बौराइ राज पदु पाएँ॥4॥
दोहा · 228
ससि गुर तिय गामी नघुषु चढ़ेउ भूमिसुर जान। लोक बेद तें बिमुख भा अधम न बेन समान॥228॥
चौपाई · 1
सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू। केहि न राजमद दीन्ह कलंकू॥ भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ। रिपु रिन रंच न राखब काउ॥1॥
चौपाई · 2
एक कीन्हि नहिं भरत भलाई। निदरे रामु जानि असहाई॥ समुझि परिहि सोउ आजु बिसेषी। समर सरोष राम मुखु पेखी॥2॥
चौपाई · 3
एतना कहत नीति रस भूला। रन रस बिटपु पुलक मिस फूला॥ प्रभु पद बंदि सीस रज राखी। बोले सत्य सहज बलु भाषी॥3॥
चौपाई · 4
अनुचित नाथ न मानब मोरा। भरत हमहि उपचार न थोरा॥ कहँ लगि सहिअ रहिअ मनु मारें। नाथ साथ धनु हाथ हमारें॥4॥
दोहा · 229
छत्रि जाति रघुकुल जनमु राम अनुग जगु जान। लातहुँ मारें चढ़ति सिर नीच को धूरि समान॥229॥
चौपाई · 1
उठि कर जोरि रजायसु मागा। मनहुँ बीर रस सोवत जागा॥ बाँधि जटा सिर कसि कटि भाथा। साजि सरासनु सायकु हाथा॥1॥
चौपाई · 2
आजु राम सेवक जसु लेऊँ। भरतहि समर सिखावन देऊँ॥ राम निरादर कर फलु पाई। सोवहुँ समर सेज दोउ भाई॥2॥
चौपाई · 3
आइ बना भल सकल समाजू। प्रगट करउँ रिस पाछिल आजू॥ जिमि करि निकर दलइ मृगराजू। लेइ लपेटि लवा जिमि बाजू॥3॥
चौपाई · 4
तैसेहिं भरतहि सेन समेता। सानुज निदरि निपातउँ खेता॥ जौं सहाय कर संकरु आई। तौ मारउँ रन राम दोहाई॥4॥
दोहा · 230
अति सरोष माखे लखनु लखि सुनि सपथ प्रवान। सभय लोक सब लोकपति चाहत भभरि भगान॥230॥
चौपाई · 1
जगु भय मगन गगन भइ बानी। लखन बाहुबलु बिपुल बखानी॥ तात प्रताप प्रभाउ तुम्हारा। को कहि सकइ को जाननिहारा॥1॥
चौपाई · 2
अनुचित उचित काजु किछु होऊ। समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ। सहसा करि पाछे पछिताहीं। कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं॥2॥
चौपाई · 3
सुनि सुर बचन लखन सकुचाने। राम सीयँ सादर सनमाने॥ कही तात तुम्ह नीति सुहाई। सब तें कठिन राजमदु भाई॥3॥
चौपाई · 4
जो अचवँत नृप मातहिं तेई। नाहिन साधुसभा जेहिं सेई॥ सुनहू लखन भल भरत सरीसा। बिधि प्रपंच महँ सुना न दीसा॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।