अयोध्याकाण्ड · 31
भरतजी का प्रयाग जाना और भरत-भरद्वाज संवाद
अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 31: भरतजी का प्रयाग जाना और भरत-भरद्वाज संवाद। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
छन्द
- : बिधि बाम की करनी कठिन जेहिं मातु कीन्ही बावरी। तेहि राति पुनि पुनि करहिं प्रभु सादर सरहना रावरी॥ तुलसी न तुम्ह सो राम प्रीतमु कहतु हौं सौंहे किएँ। परिनाम मंगल जानि अपने आनिए धीरजु हिएँ॥
सोरठा · 201
अंतरजामी रामु सकुच सप्रेम कृपायतन। चलिअ करिअ बिश्रामु यह बिचारि दृढ़ आनि मन॥201॥
चौपाई · 1
सखा बचन सुनि उर धरि धीरा। बास चले सुमिरत रघुबीरा॥ यह सुधि पाइ नगर नर नारी। चले बिलोकन आरत भारी॥1॥
चौपाई · 2
परदखिना करि करहिं प्रनामा। देहिं कैकइहि खोरि निकामा। भरि भरि बारि बिलोचन लेंहीं। बाम बिधातहि दूषन देहीं॥2॥
चौपाई · 3
एक सराहहिं भरत सनेहू। कोउ कह नृपति निबाहेउ नेहू॥ निंदहिं आपु सराहि निषादहि। को कहि सकइ बिमोह बिषादहि॥3॥
चौपाई · 4
ऐहि बिधि राति लोगु सबु जागा। भा भिनुसार गुदारा लागा॥ गुरहि सुनावँ चढ़ाइ सुहाईं। नईं नाव सब मातु चढ़ाईं॥4॥
चौपाई · 5
दंड चारि महँ भा सबु पारा। उतरि भरत तब सबहि सँभारा॥5॥
दोहा · 202
प्रातक्रिया करि मातु पद बंदि गुरहि सिरु नाइ। आगें किए निषाद गन दीन्हेउ कटकु चलाइ॥202॥
चौपाई · 1
कियउ निषादनाथु अगुआईं। मातु पालकीं सकल चलाईं॥ साथ बोलाइ भाइ लघु दीन्हा। बिप्रन्ह सहित गवनु गुर कीन्हा॥1॥
चौपाई · 2
आपु सुरसरिहि कीन्ह प्रनामू। सुमिरे लखन सहित सिय रामू॥ गवने भरत पयादेहिं पाए। कोतल संग जाहिं डोरिआए॥2॥
चौपाई · 3
कहहिं सुसेवक बारहिं बारा। होइअ नाथ अस्व असवारा॥ रामु पयादेहि पायँ सिधाए। हम कहँ रथ गज बाजि बनाए॥3॥
चौपाई · 4
सिर भर जाउँ उचित अस मोरा। सब तें सेवक धरमु कठोरा॥ देखि भरत गति सुनि मृदु बानी। सब सेवक गन गरहिं गलानी॥4॥
दोहा · 203
भरत तीसरे पहर कहँ कीन्ह प्रबेसु प्रयाग। कहत राम सिय राम सिय उमगि उमगि अनुराग॥203॥
चौपाई · 1
झलका झलकत पायन्ह कैसें। पंकज कोस ओस कन जैसें॥ भरत पयादेहिं आए आजू। भयउ दुखित सुनि सकल समाजू॥1॥
चौपाई · 2
खबरि लीन्ह सब लोग नहाए। कीन्ह प्रनामु त्रिबेनिहिं आए॥ सबिधि सितासित नीर नहाने। दिए दान महिसुर सनमाने॥2॥
चौपाई · 3
देखत स्यामल धवल हलोरे। पुलकि सरीर भरत कर जोरे॥ सकल काम प्रद तीरथराऊ। बेद बिदित जग प्रगट प्रभाऊ॥3॥
चौपाई · 4
मागउँ भीख त्यागि निज धरमू। आरत काह न करइ कुकरमू॥ अस जियँ जानि सुजान सुदानी। सफल करहिं जग जाचक बानी॥4॥
दोहा · 204
अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान। जनम-जनम रति राम पद यह बरदानु न आन॥204॥
चौपाई · 1
जानहुँ रामु कुटिल करि मोही। लोग कहउ गुर साहिब द्रोही॥ सीता राम चरन रति मोरें। अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें॥1॥
चौपाई · 2
जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ। जाचत जलु पबि पाहन डारउ॥ चातकु रटिन घटें घटि जाई। बढ़ें प्रेमु सब भाँति भलाई॥2॥
चौपाई · 3
कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें। तिमि प्रियतम पद नेम निबाहें॥ भरत बचन सुनि माझ त्रिबेनी। भइ मृदु बानि सुमंगल देनी॥3॥
चौपाई · 4
तात भरत तुम्ह सब बिधि साधू। राम चरन अनुराग अगाधू॥ बादि गलानि करहु मन माहीं। तुम्ह सम रामहि कोउ प्रिय नाहीं॥4॥
दोहा · 205
तनु पुलकेउ हियँ हरषु सुनि बेनि बचन अनुकूल। भरत धन्य कहि धन्य सुर हरषित बरषहिं फूल॥205॥
चौपाई · 1
प्रमुदित तीरथराज निवासी। बैखानस बटु गृही उदासी॥ कहहिं परसपर मिलि दस पाँचा। भरत सनेहु सीलु सुचि साँचा॥1॥
चौपाई · 2
सुनत राम गुन ग्राम सुहाए। भरद्वाज मुनिबर पहिं आए॥ दंड प्रनामु करत मुनि देखे। मूरतिमंत भाग्य निज लेखे॥2॥
चौपाई · 3
धाइ उठाइ लाइ उर लीन्हे। दीन्हि असीस कृतारथ कीन्हे॥ आसनु दीन्ह नाइ सिरु बैठे। चहत सकुच गृहँ जनु भजि पैठे॥3॥
चौपाई · 4
मुनि पूँछब कछु यह बड़ सोचू। बोले रिषि लखि सीलु सँकोचू॥ सुनहु भरत हम सब सुधि पाई। बिधि करतब पर किछु न बसाई॥4॥
दोहा · 206
तुम्ह गलानि जियँ जनि करहु समुझि मातु करतूति। तात कैकइहि दोसु नहिं गई गिरा मति धूति॥206॥
चौपाई · 1
यहउ कहत भल कहिहि न कोऊ। लोकु बेदु बुध संमत दोऊ॥ तात तुम्हार बिमल जसु गाई। पाइहि लोकउ बेदु बड़ाई॥1॥
चौपाई · 2
लोक बेद संमत सबु कहई। जेहि पितु देइ राजु सो लहई॥ राउ सत्यब्रत तुम्हहि बोलाई। देत राजु सुखु धरमु बड़ाई॥2॥
चौपाई · 3
राम गवनु बन अनरथ मूला। जो सुनि सकल बिस्व भइ सूला॥ सो भावी बस रानि अयानी। करि कुचालि अंतहुँ पछितानी॥3॥
चौपाई · 4
तहँउँ तुम्हार अलप अपराधू। कहै सो अधम अयान असाधू॥ करतेहु राजु त तुम्हहि ना दोषू। रामहि होत सुनत संतोषू॥4॥
दोहा · 207
अब अति कीन्हेहु भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु। सकल सुमंगल मूल जग रघुबर चरन सनेहु॥207॥
चौपाई · 1
सो तुम्हार धनु जीवनु प्राना। भूरिभाग को तुम्हहि समाना॥ यह तुम्हार आचरजु न ताता। दसरथ सुअन राम प्रिय भ्राता॥1॥
चौपाई · 2
सुनहु भरत रघुबर मन माहीं। पेम पात्रु तुम्ह सम कोउ नाहीं॥ लखन राम सीतहि अति प्रीती। निसि सब तुम्हहि सराहत बीती॥2॥
चौपाई · 3
जाना मरमु नहात प्रयागा। मगन होहिं तुम्हरें अनुरागा॥ तुम्ह पर अस सनेहु रघुबर कें। सुख जीवन जग जस जड़ नर कें॥3॥
चौपाई · 4
यह न अधिक रघुबीर बड़ाई। प्रनत कुटुंब पाल रघुराई॥ तुम्ह तौ भरत मोर मत एहू। धरें देह जनु राम सनेहू॥4॥
दोहा · 208
तुम्ह कहँ भरत कलंक यह हम सब कहँ उपदेसु। राम भगति रस सिद्धि हित भा यह समउ गनेसु॥208॥
चौपाई · 1
नव बिधु बिमल तात जसु तोरा। रघुबर किंकर कुमुद चकोरा॥ उदित सदा अँथइहि कबहूँ ना। घटिहि न जग नभ दिन दिन दूना॥1॥
चौपाई · 2
कोक तिलोक प्रीति अति करिही। प्रभु प्रताप रबि छबिहि न हरिही॥ निसि दिन सुखद सदा सब काहू। ग्रसिहि न कैकइ करतबु राहू॥2॥
चौपाई · 3
पूरन राम सुपेम पियूषा। गुर अवमान दोष नहिं दूषा॥ राम भगत अब अमिअँ अघाहूँ। कीन्हेहु सुलभ सुधा बसुधाहूँ॥3॥
चौपाई · 4
भूप भगीरथ सुरसरि आनी। सुमिरत सकल सुमंगल खानी॥ दसरथ गुन गन बरनि न जाहीं। अधिकु कहा जेहि सम जग नाहीं॥4॥
दोहा · 209
जासु सनेह सकोच बस राम प्रगट भए आई। जे हर हिय नयननि कबहुँ निरखे नहीं अघाइ॥209॥
चौपाई · 1
कीरति बिधु तुम्ह कीन्ह अनूपा। जहँ बस राम पेम मृगरूपा॥ तात गलानि करहु जियँ जाएँ। डरहु दरिद्रहि पारसु पाएँ॥1॥
चौपाई · 2
सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं। उदासीन तापस बन रहहीं॥ सब साधन कर सुफल सुहावा। लखन राम सिय दरसनु पावा॥2॥
चौपाई · 3
तेहि फल कर फलु दरस तुम्हारा। सहित प्रयाग सुभाग हमारा॥ भरत धन्य तुम्ह जसु जगु जयऊ। कहि अस प्रेम मगन मुनि भयऊ॥3॥
चौपाई · 4
सुनि मुनि बचन सभासद हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे॥ धन्य धन्य धुनि गगन प्रयागा। सुनि सुनि भरतु मगन अनुरागा॥4॥
दोहा · 210
पुलक गात हियँ रामु सिय सजल सरोरुह नैन। करि प्रनामु मुनि मंडलिहि बोले गदगद बैन॥210॥
चौपाई · 1
मुनि समाजु अरु तीरथराजू। साँचिहुँ सपथ अघाइ अकाजू॥ एहिं थल जौं किछु कहिअ बनाई। एहि सम अधिक न अघ अधमाई॥1॥
चौपाई · 2
तुम्ह सर्बग्य कहउँ सतिभाऊ। उर अंतरजामी रघुराऊ॥ मोहि न मातु करतब कर सोचू। नहिं दुखु जियँ जगु जानिहि पोचू॥2॥
चौपाई · 3
नाहिन डरु बिगरिहि परलोकू। पितहु मरन कर मोहि न सोकू॥ सुकृत सुजस भरि भुअन सुहाए। लछिमन राम सरिस सुत पाए॥3॥
चौपाई · 4
राम बिरहँ तजि तनु छनभंगू। भूप सोच कर कवन प्रसंगू॥ राम लखन सिय बिनु पग पनहीं। करि मुनि बेष फिरहिं बन बनहीं॥4॥
दोहा · 211
अजिन बसन फल असन महि सयन डासि कुस पात। बसि तरु तर नित सहत हिम आतप बरषा बात॥211॥
चौपाई · 1
एहि दुख दाहँ दहइ दिन छाती। भूख न बासर नीद न राती॥ एहि कुरोग कर औषधु नाहीं। सोधेउँ सकल बिस्व मन माहीं॥1॥
चौपाई · 2
मातु कुमत बढ़ई अघ मूला। तेहिं हमार हित कीन्ह बँसूला॥ कलि कुकाठ कर कीन्ह कुजंत्रू। गाड़ि अवधि पढ़ि कठिन कुमंत्रू॥2॥
चौपाई · 3
मोहि लगि यहु कुठाटु तेहिं ठाटा। घालेसि सब जगु बारहबाटा॥ मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ। बसइ अवध नहिं आन उपाएँ॥3॥
चौपाई · 4
भरत बचन सुनि मुनि सुखु पाई। सबहिं कीन्हि बहु भाँति बड़ाई॥ तात करहु जनि सोचु बिसेषी। सब दुखु मिटिहि राम पग देखी॥4॥
दोहा · 212
करि प्रबोधु मुनिबर कहेउ अतिथि पेमप्रिय होहु। कंद मूल फल फूल हम देहिं लेहु करि छोहु॥212॥
चौपाई · 1
सुनि मुनि बचन भरत हियँ सोचू। भयउ कुअवसर कठिन सँकोचू॥ जानि गुरुइ गुर गिरा बहोरी। चरन बंदि बोले कर जोरी॥1॥
चौपाई · 2
सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरम यहु नाथ हमारा॥ भरत बचन मुनिबर मन भाए। सुचि सेवक सिष निकट बोलाए॥2॥
चौपाई · 3
चाहिअ कीन्हि भरत पहुनाई। कंद मूल फल आनहु जाई। भलेहिं नाथ कहि तिन्ह सिर नाए। प्रमुदित निज निज काज सिधाए॥3॥
चौपाई · 4
मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता। तसि पूजा चाहिअ जस देवता॥ सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आईं। आयसु होइ सो करहिं गोसाईं॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।