अयोध्याकाण्ड · 27

वशिष्ठ-भरत संवाद, श्री रामजी को अयोध्या वापस लाने की तैयारी

अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 27: वशिष्ठ-भरत संवाद, श्री रामजी को अयोध्या वापस लाने की तैयारी। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।

व्हाट्सऐपटेलीग्राम

दोहा · 171

सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ। हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ॥171॥

चौपाई · 1

अस बिचारि केहि देइअ दोसू। ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू॥ तात बिचारु करहु मन माहीं। सोच जोगु दसरथु नृपु नाहीं॥1॥

चौपाई · 2

सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना। तजि निज धरमु बिषय लयलीना॥ सोचिअ नृपति जो नीति न जाना। जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना॥2॥

चौपाई · 3

सोचिअ बयसु कृपन धनवानू। जो न अतिथि सिव भगति सुजानू॥ सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी। मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी॥3॥

चौपाई · 4

सोचिअ पुनि पति बंचक नारी। कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी॥ सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई। जो नहिं गुर आयसु अनुसरई॥4॥

दोहा · 172

सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग। सोचिअ जती प्रपंच रत बिगत बिबेक बिराग॥172॥

चौपाई · 1

बैखानस सोइ सोचै जोगू। तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू॥ सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी। जननि जनक गुर बंधु बिरोधी॥1॥

चौपाई · 2

सब बिधि सोचिअ पर अपकारी। निज तनु पोषक निरदय भारी॥ सोचनीय सबहीं बिधि सोई। जो न छाड़ि छलु हरि जन होई॥2॥

चौपाई · 3

सोचनीय नहिं कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ॥ भयउ न अहइ न अब होनिहारा। भूप भरत जस पिता तुम्हारा॥3॥

चौपाई · 4

बिधि हरि हरु सुरपति दिसिनाथा। बरनहिं सब दसरथ गुन गाथा॥4॥

दोहा · 173

कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तासु। राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु॥173॥

चौपाई · 1

सब प्रकार भूपति बड़भागी। बादि बिषादु करिअ तेहि लागी॥ यह सुनि समुझि सोचु परिहरहू। सिर धरि राज रजायसु करहू॥1॥

चौपाई · 2

रायँ राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा। पिता बचनु फुर चाहिअ कीन्हा॥ तजे रामु जेहिं बचनहि लागी। तनु परिहरेउ राम बिरहागी॥2॥

चौपाई · 3

नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना। करहु तात पितु बचन प्रवाना॥ करहु सीस धरि भूप रजाई। हइ तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई॥3॥

चौपाई · 4

परसुराम पितु अग्या राखी। मारी मातु लोक सब साखी॥ तनय जजातिहि जौबनु दयऊ। पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ॥4॥

दोहा · 174

अनुचित उचित बिचारु तजि ते पालहिं पितु बैन। ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन॥174॥

चौपाई · 1

अवसि नरेस बचन फुर करहू। पालहु प्रजा सोकु परिहरहू॥ सुरपुर नृपु पाइहि परितोषू। तुम्ह कहुँ सुकृतु सुजसु नहिं दोषू॥1॥

चौपाई · 2

बेद बिदित संमत सबही का। जेहि पितु देइ सो पावइ टीका॥ करहु राजु परिहरहु गलानी। मानहु मोर बचन हित जानी॥2॥

चौपाई · 3

सुनि सुखु लहब राम बैदेहीं। अनुचित कहब न पंडित केहीं॥ कौसल्यादि सकल महतारीं। तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारीं॥3॥

चौपाई · 4

परम तुम्हार राम कर जानिहि। सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि॥ सौंपेहु राजु राम के आएँ। सेवा करेहु सनेह सुहाएँ॥4॥

दोहा · 175

कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि। रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि॥175॥

चौपाई · 1

कौसल्या धरि धीरजु कहई। पूत पथ्य गुर आयसु अहई॥ सो आदरिअ करिअ हित मानी। तजिअ बिषादु काल गति जानी॥1॥

चौपाई · 2

बन रघुपति सुरपति नरनाहू। तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू॥ परिजन प्रजा सचिव सब अंबा। तुम्हहीं सुत सब कहँ अवलंबा॥2॥

चौपाई · 3

लखि बिधि बाम कालु कठिनाई। धीरजु धरहु मातु बलि जाई॥ सिर धरि गुर आयसु अनुसरहू। प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू॥3॥

चौपाई · 4

गुरु के बचन सचिव अभिनंदनु। सुने भरत हिय हित जनु चंदनु॥ सुनी बहोरि मातु मृदु बानी। सील सनेह सरल रस सानी॥4॥

छन्द

सानी सरल रस मातु बानी सुनि भरतु ब्याकुल भए। लोचन सरोरुह स्रवत सींचत बिरह उर अंकुर नए॥ सो दसा देखत समय तेहि बिसरी सबहि सुधि देह की। तुलसी सराहत सकल सादर सीवँ सहज सनेह की॥

सोरठा · 176

भरतु कमल कर जोरि धीर धुरंधर धीर धरि। बचन अमिअँ जनु बोरि देत उचित उत्तर सबहि॥176॥

चौपाई · 1

मोहि उपदेसु दीन्ह गुरु नीका। प्रजा सचिव संमत सबही का॥ मातु उचित धरि आयसु दीन्हा। अवसि सीस धरि चाहउँ कीन्हा॥1॥

चौपाई · 2

गुर पितु मातु स्वामि हित बानी। सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी॥ उचित कि अनुचित किएँ बिचारू। धरमु जाइ सिर पातक भारू॥2॥

चौपाई · 3

तुम्ह तौ देहु सरल सिख सोई। जो आचरत मोर भल होई॥ जद्यपि यह समुझत हउँ नीकें। तदपि होत परितोष न जी कें॥3॥

चौपाई · 4

अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू। मोहि अनुहरत सिखावनु देहू॥ ऊतरु देउँ छमब अपराधू। दुखित दोष गुन गनहिं न साधू॥4॥

दोहा · 177

पितु सुरपुर सिय रामु बन करन कहहु मोहि राजु। एहि तें जानहु मोर हित कै आपन बड़ काजु॥177॥

चौपाई · 1

हित हमार सियपति सेवकाईं। सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाईं॥ मैं अनुमानि दीख मन माहीं। आन उपायँ मोर हित नाहीं॥1॥

चौपाई · 2

सोक समाजु राजु केहि लेखें। लखन राम सिय बिनु पद देखें॥ बादि बसन बिनु भूषन भारू। बादि बिरति बिनु ब्रह्मबिचारू॥2॥

चौपाई · 3

सरुज सरीर बादि बहु भोगा। बिनु हरिभगति जायँ जप जोगा॥ जायँ जीव बिनु देह सुहाई। बादि मोर सबु बिनु रघुराई॥3॥

चौपाई · 4

जाउँ राम पहिं आयसु देहू। एकाहिं आँक मोर हित एहू॥ मोहि नृप करि भल आपन चहहू। सोउ सनेह जड़ता बस कहहू॥4॥

दोहा · 178

कैकेई सुअ कुटिलमति राम बिमुख गतलाज। तुम्ह चाहत सुखु मोहबस मोहि से अधम कें राज॥178॥

चौपाई · 1

कहउँ साँचु सब सुनि पतिआहू। चाहिअ धरमसील नरनाहू॥ मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं। रसा रसातल जाइहि तबहीं॥1॥

चौपाई · 2

मोहि समान को पाप निवासू। जेहि लगि सीय राम बनबासू॥ रायँ राम कहुँ काननु दीन्हा। बिछुरत गमनु अमरपुर कीन्हा॥2॥

चौपाई · 3

मैं सठु सब अनरथ कर हेतू। बैठ बात सब सुनउँ सचेतू॥ बिन रघुबीर बिलोकि अबासू। रहे प्रान सहि जग उपहासू॥3॥

चौपाई · 4

राम पुनीत बिषय रस रूखे। लोलुप भूमि भोग के भूखे॥ कहँ लगि कहौं हृदय कठिनाई। निदरि कुलिसु जेहिं लही बड़ाई॥4॥

दोहा · 179

कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहिं मोर। कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर॥179॥

चौपाई · 1

कैकेई भव तनु अनुरागे। पावँर प्रान अघाइ अभागे॥ जौं प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे। देखब सुनब बहुत अब आगे॥1॥

चौपाई · 2

लखन राम सिय कहुँ बनु दीन्हा। पठइ अमरपुर पति हित कीन्हा॥ लीन्ह बिधवपन अपजसु आपू। दीन्हेउ प्रजहि सोकु संतापू॥2॥

चौपाई · 3

मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू। कीन्ह कैकईं सब कर काजू॥ ऐहि तें मोर काह अब नीका। तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका॥3॥

चौपाई · 4

कैकइ जठर जनमि जग माहीं। यह मोहि कहँ कछु अनुचित नाहीं॥ मोरि बात सब बिधिहिं बनाई। प्रजा पाँच कत करहु सहाई॥4॥

दोहा · 180

ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार। तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार॥180॥

चौपाई · 1

कैकइ सुअन जोगु जग जोई। चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई॥ दसरथ तनय राम लघु भाई। दीन्हि मोहि बिधि बादि बड़ाई॥1॥

चौपाई · 2

तुम्ह सब कहहु कढ़ावन टीका। राय रजायसु सब कहँ नीका॥ उतरु देउँ केहि बिधि केहि केही। कहहु सुखेन जथा रुचि जेही॥2॥

चौपाई · 3

मोहि कुमातु समेत बिहाई। कहहु कहिहि के कीन्ह भलाई॥ मो बिनु को सचराचर माहीं। जेहि सिय रामु प्रानप्रिय नाहीं॥3॥

चौपाई · 4

परम हानि सब कहँ बड़ लाहू। अदिनु मोर नहिं दूषन काहू॥ संसय सील प्रेम बस अहहू। सबुइ उचित सब जो कछु कहहू॥4॥

दोहा · 181

राम मातु सुठि सरलचित मो पर प्रेमु बिसेषि। कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि॥181॥

चौपाई · 1

गुर बिबेक सागर जगु जाना। जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना॥ मो कहँ तिलक साज सज सोऊ। भएँ बिधि बिमुख बिमुख सबु कोऊ॥1॥

चौपाई · 2

परिहरि रामु सीय जग माहीं। कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं॥ सो मैं सुनब सहब सुखु मानी। अंतहुँ कीच तहाँ जहँ पानी॥2॥

चौपाई · 3

डरु न मोहि जग कहिहि कि पोचू। परलोकहु कर नाहिन सोचू॥ एकइ उर बस दुसह दवारी। मोहि लगि भे सिय रामु दुखारी॥3॥

चौपाई · 4

जीवन लाहु लखन भल पावा। सबु तजि राम चरन मनु लावा॥ मोर जनम रघुबर बन लागी। झूठ काह पछिताउँ अभागी॥4॥

दोहा · 182

आपनि दारुन दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ। देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ॥182॥

चौपाई · 1

आन उपाउ मोहि नहिं सूझा। को जिय कै रघुबर बिनु बूझा॥ एकहिं आँक इहइ मन माहीं। प्रातकाल चलिहउँ प्रभु पाहीं॥1॥

चौपाई · 2

जद्यपि मैं अनभल अपराधी। भै मोहि कारन सकल उपाधी॥ तदपि सरन सनमुख मोहि देखी। छमि सब करिहहिं कृपा बिसेषी॥2॥

चौपाई · 3

सील सकुच सुठि सरल सुभाऊ। कृपा सनेह सदन रघुराऊ॥ अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा। मैं सिसु सेवक जद्यपि बामा॥3॥

चौपाई · 4

तुम्ह पै पाँच मोर भल मानी। आयसु आसिष देहु सुबानी॥ जेहिं सुनि बिनय मोहि जनु जानी। आवहिं बहुरि रामु रजधानी॥4॥

व्हाट्सऐपटेलीग्राम

गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।