अयोध्याकाण्ड · 21
चित्रकूट में निवास, कोल-भीलों के द्वारा सेवा
अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 21: चित्रकूट में निवास, कोल-भीलों के द्वारा सेवा। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 132
चित्रकूट महिमा अमित कही महामुनि गाइ। आइ नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ॥132॥
चौपाई · 1
रघुबर कहेउ लखन भल घाटू। करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू॥ लखन दीख पय उतर करारा। चहुँ दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा॥1॥
चौपाई · 2
नदी पनच सर सम दम दाना। सकल कलुष कलि साउज नाना॥ चित्रकूट जनु अचल अहेरी। चुकइ न घात मार मुठभेरी॥2॥
चौपाई · 3
अस कहि लखन ठाउँ देखरावा। थलु बिलोकि रघुबर सुखु पावा॥ रमेउ राम मनु देवन्ह जाना। चले सहित सुर थपति प्रधाना॥3॥
चौपाई · 4
कोल किरात बेष सब आए। रचे परन तृन सदन सुहाए॥ बरनि न जाहिं मंजु दुइ साला। एक ललित लघु एक बिसाला॥4॥
दोहा · 133
लखन जानकी सहित प्रभु राजत रुचिर निकेत। सोह मदनु मुनि बेष जनु रति रितुराज समेत॥133॥
चौपाई · 1
अमर नाग किंनर दिसिपाला। चित्रकूट आए तेहि काला॥ राम प्रनामु कीन्ह सब काहू। मुदित देव लहि लोचन लाहू॥1॥
चौपाई · 2
बरषि सुमन कह देव समाजू। नाथ सनाथ भए हम आजू॥ करि बिनती दुख दुसह सुनाए। हरषित निज निज सदन सिधाए॥2॥
चौपाई · 3
चित्रकूट रघुनंदनु छाए। समाचार सुनि सुनि मुनि आए॥ आवत देखि मुदित मुनिबृंदा। कीन्ह दंडवत रघुकुल चंदा॥3॥
चौपाई · 4
मुनि रघुबरहि लाइ उर लेहीं। सुफल होन हित आसिष देहीं॥ सिय सौमित्रि राम छबि देखहिं। साधन सकल सफल करि लेखहिं॥4॥
दोहा · 134
जथाजोग सनमानि प्रभु बिदा किए मुनिबृंद। करहिं जोग जप जाग तप निज आश्रमन्हि सुछंद॥134॥
चौपाई · 1
यह सुधि कोल किरातन्ह पाई। हरषे जनु नव निधि घर आई॥ कंद मूल फल भरि भरि दोना। चले रंक जनु लूटन सोना॥1॥
चौपाई · 2
तिन्ह महँ जिन्ह देखे दोउ भ्राता। अपर तिन्हहि पूँछहिं मगु जाता॥ कहत सुनत रघुबीर निकाई। आइ सबन्हि देखे रघुराई॥2॥
चौपाई · 3
करहिं जोहारु भेंट धरि आगे। प्रभुहि बिलोकहिं अति अनुरागे॥ चित्र लिखे जनु जहँ तहँ ठाढ़े। पुलक सरीर नयन जल बाढ़े॥3॥
चौपाई · 4
राम सनेह मगन सब जाने। कहि प्रिय बचन सकल सनमाने॥ प्रभुहि जोहारि बहोरि बहोरी। बचन बिनीत कहहिंकर जोरी॥4॥
दोहा · 135
अब हम नाथ सनाथ सब भए देखि प्रभु पाय। भाग हमारें आगमनु राउर कोसलराय॥135॥
चौपाई · 1
धन्य भूमि बन पंथ पहारा। जहँ जहँ नाथ पाउ तुम्ह धारा॥ धन्य बिहग मृग काननचारी। सफल जनम भए तुम्हहि निहारी॥1॥
चौपाई · 2
हम सब धन्य सहित परिवारा। दीख दरसु भरि नयन तुम्हारा॥ कीन्ह बासु भल ठाउँ बिचारी। इहाँ सकल रितु रहब सुखारी॥2॥
चौपाई · 3
हम सब भाँति करब सेवकाई। करि केहरि अहि बाघ बराई॥ बन बेहड़ गिरि कंदर खोहा। सब हमार प्रभु पग पग जोहा॥3॥
चौपाई · 4
तहँ तहँ तुम्हहि अहेर खेलाउब। सर निरझर जलठाउँ देखाउब॥ हम सेवक परिवार समेता। नाथ न सकुचब आयसु देता॥4॥
दोहा · 136
बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन। बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन॥136॥
चौपाई · 1
रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जान निहारा॥ राम सकल बनचर तब तोषे। कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे॥1॥
चौपाई · 2
बिदा किए सिर नाइ सिधाए। प्रभु गुन कहत सुनत घर आए॥ एहि बिधि सिय समेत दोउ भाई। बसहिं बिपिन सुर मुनि सुखदाई॥2॥
चौपाई · 3
जब तें आइ रहे रघुनायकु। तब तें भयउ बनु मंगलदायकु॥ फूलहिं फलहिं बिटप बिधि नाना। मंजु बलित बर बेलि बिताना॥3॥
चौपाई · 4
सुरतरु सरिस सुभायँ सुहाए। मनहुँ बिबुध बन परिहरि आए॥ गुंज मंजुतर मधुकर श्रेनी। त्रिबिध बयारि बहइ सुख देनी॥4॥
दोहा · 137
नीलकंठ कलकंठ सुक चातक चक्क चकोर। भाँति भाँति बोलहिं बिहग श्रवन सुखद चित चोर॥137॥
चौपाई · 1
करि केहरि कपि कोल कुरंगा। बिगतबैर बिचरहिं सब संगा॥ फिरत अहेर राम छबि देखी। होहिं मुदित मृग बृंद बिसेषी॥1॥
चौपाई · 2
बिबुध बिपिन जहँ लगि जग माहीं। देखि रामबनु सकल सिहाहीं॥ सुरसरि सरसइ दिनकर कन्या। मेकलसुता गोदावरि धन्या॥2॥
चौपाई · 3
सब सर सिंधु नदीं नद नाना। मंदाकिनि कर करहिं बखाना॥ उदय अस्त गिरि अरु कैलासू। मंदर मेरु सकल सुरबासू॥3॥
चौपाई · 4
सैल हिमाचल आदिक जेते। चित्रकूट जसु गावहिं तेते॥ बिंधि मुदित मन सुखु न समाई। श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई॥4॥
दोहा · 138
चित्रकूट के बिहग मृग बेलि बिटप तृन जाति। पुन्य पुंज सब धन्य अस कहहिं देव दिन राति॥138॥
चौपाई · 1
नयनवंत रघुबरहि बिलोकी। पाइ जनम फल होहिं बिसोकी॥ परसि चरन रज अचर सुखारी। भए परम पद के अधिकारी॥1॥
चौपाई · 2
सो बनु सैलु सुभायँ सुहावन। मंगलमय अति पावन पावन॥ महिमा कहिअ कवनि बिधि तासू। सुखसागर जहँ कीन्ह निवासू॥2॥
चौपाई · 3
पय पयोधि तजि अवध बिहाई। जहँ सिय लखनु रामु रहे आई॥ कहि न सकहिं सुषमा जसि कानन। जौं सत सहस होहिं सहसानन॥3॥
चौपाई · 4
सो मैं बरनि कहौं बिधि केहीं। डाबर कमठ कि मंदर लेहीं॥ सेवहिं लखनु करम मन बानी। जाइ न सीलु सनेहु बखानी॥4॥
दोहा · 139
छिनु छिनु लखि सिय राम पद जानि आपु पर नेहु। करत न सपनेहुँ लखनु चितु बंधु मातु पितु गेहु॥139॥
चौपाई · 1
राम संग सिय रहति सुखारी। पुर परिजन गृह सुरति बिसारी॥ छिनु छिनु पिय बिधु बदनु निहारी। प्रमुदित मनहुँ चकोर कुमारी॥1॥
चौपाई · 2
नाह नेहु नित बढ़त बिलोकी। हरषित रहति दिवस जिमि कोकी॥ सिय मनु राम चरन अनुरागा। अवध सहस सम बनु प्रिय लागा॥2॥
चौपाई · 3
परनकुटी प्रिय प्रियतम संगा। प्रिय परिवारु कुरंग बिहंगा॥ सासु ससुर सम मुनितिय मुनिबर। असनु अमिअ सम कंद मूल फर॥3॥
चौपाई · 4
नाथ साथ साँथरी सुहाई। मयन सयन सय सम सुखदाई॥ लोकप होहिं बिलोकत जासू। तेहि कि मोहि सक बिषय बिलासू॥4॥
दोहा · 140
सुमिरत रामहि तजहिं जन तृन सम बिषय बिलासु। रामप्रिया जग जननि सिय कछु न आचरजु तासु॥140॥
चौपाई · 1
सीय लखन जेहि बिधि सुखु लहहीं। सोइ रघुनाथ करहिं सोइ कहहीं॥ कहहिं पुरातन कथा कहानी। सुनहिं लखनु सिय अति सुखु मानी॥1॥
चौपाई · 2
जब जब रामु अवध सुधि करहीं। तब तब बारि बिलोचन भरहीं॥ सुमिरि मातु पितु परिजन भाई। भरत सनेहु सीलु सेवकाई॥2॥
चौपाई · 3
कृपासिंधु प्रभु होहिं दुखारी। धीरजु धरहिं कुसमउ बिचारी॥ लखि सिय लखनु बिकल होइ जाहीं। जिमि पुरुषहि अनुसर परिछाहीं॥3॥
चौपाई · 4
प्रिया बंधु गति लखि रघुनंदनु। धीर कृपाल भगत उर चंदनु॥ लगे कहन कछु कथा पुनीता। सुनि सुखु लहहिं लखनु अरु सीता॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।