अयोध्याकाण्ड · 09
श्री सीता-राम तथा माता कौसल्या संवाद
अयोध्याकाण्ड का प्रकरण 9: श्री सीता-राम तथा माता कौसल्या संवाद। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
चौपाई · 1
मातु समीप कहत सकुचाहीं। बोले समउ समुझि मन माहीं॥ राजकुमारि सिखावनु सुनहू। आन भाँति जियँ जनि कछु गुनहू॥1॥
चौपाई · 2
आपन मोर नीक जौं चहहू। बचनु हमार मानि गृह रहहू॥ आयसु मोर सासु सेवकाई। सब बिधि भामिनि भवन भलाई॥2॥
चौपाई · 3
एहि ते अधिक धरमु नहिं दूजा। सादर सासु ससुर पद पूजा॥ जब जब मातु करिहि सुधि मोरी। होइहि प्रेम बिकल मति भोरी॥3॥
चौपाई · 4
तब तब तुम्ह कहि कथा पुरानी। सुंदरि समुझाएहु मृदु बानी॥ कहउँ सुभायँ सपथ सत मोही। सुमुखि मातु हित राखउँ तोही॥4॥
दोहा · 61
गुर श्रुति संमत धरम फलु पाइअ बिनहिं कलेस। हठ बस सब संकट सहे गालव नहुष नरेस॥61॥
चौपाई · 1
मैं पुनि करि प्रवान पितु बानी। बेगि फिरब सुनु सुमुखि सयानी॥ दिवस जात नहिं लागिहि बारा। सुंदरि सिखवनु सुनहु हमारा॥1॥
चौपाई · 2
जौं हठ करहु प्रेम बस बामा। तौ तुम्ह दुखु पाउब परिनामा॥ काननु कठिन भयंकरु भारी। घोर घामु हिम बारि बयारी॥2॥
चौपाई · 3
कुस कंटक मग काँकर नाना। चलब पयादेहिं बिनु पदत्राना॥ चरन कमल मृदु मंजु तुम्हारे। मारग अगम भूमिधर भारे॥3॥
चौपाई · 4
कंदर खोह नदीं नद नारे। अगम अगाध न जाहिं निहारे॥ भालु बाघ बृक केहरि नागा। करहिं नाद सुनि धीरजु भागा॥4॥
दोहा · 62
भूमि सयन बलकल बसन असनु कंद फल मूल। ते कि सदा सब दिन मिलहिं सबुइ समय अनुकूल॥62॥
चौपाई · 1
नर अहार रजनीचर चरहीं। कपट बेष बिधि कोटिक करहीं॥ लागइ अति पहार कर पानी। बिपिन बिपति नहिं जाइ बखानी॥1॥
चौपाई · 2
ब्याल कराल बिहग बन घोरा। निसिचर निकर नारि नर चोरा॥ डरपहिं धीर गहन सुधि आएँ। मृगलोचनि तुम्ह भीरु सुभाएँ॥2॥
चौपाई · 3
हंसगवनि तुम्ह नहिं बन जोगू। सुनि अपजसु मोहि देइहि लोगू॥ मानस सलिल सुधाँ प्रतिपाली। जिअइ कि लवन पयोधि मराली॥3॥
चौपाई · 4
नव रसाल बन बिहरनसीला। सोह कि कोकिल बिपिन करीला॥ रहहु भवन अस हृदयँ बिचारी। चंदबदनि दुखु कानन भारी॥4॥
दोहा · 63
सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि। सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि॥63॥
चौपाई · 1
सुनि मृदु बचन मनोहर पिय के। लोचन ललित भरे जल सिय के॥ सीतल सिख दाहक भइ कैसें। चकइहि सरद चंद निसि जैसें॥1॥
चौपाई · 2
उतरु न आव बिकल बैदेही। तजन चहत सुचि स्वामि सनेही॥ बरबस रोकि बिलोचन बारी। धरि धीरजु उर अवनिकुमारी॥2॥
चौपाई · 3
लागि सासु पग कह कर जोरी। छमबि देबि बड़ि अबिनय मोरी। दीन्हि प्रानपति मोहि सिख सोई। जेहि बिधि मोर परम हित होई॥3॥
चौपाई · 4
मैं पुनि समुझि दीखि मन माहीं। पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं॥4॥
दोहा · 64
प्राननाथ करुनायतन सुंदर सुखद सुजान। तुम्ह बिनु रघुकुल कुमुद बिधु सुरपुर नरक समान॥64॥
चौपाई · 1
मातु पिता भगिनी प्रिय भाई। प्रिय परिवारु सुहृदय समुदाई॥ सासु ससुर गुर सजन सहाई। सुत सुंदर सुसील सुखदाई॥1॥
चौपाई · 2
जहँ लगिनाथ नेह अरु नाते। पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते॥ तनु धनु धामु धरनि पुर राजू। पति बिहीन सबु सोक समाजू॥2॥
चौपाई · 3
भोग रोगसम भूषन भारू। जम जातना सरिस संसारू॥ प्राननाथ तुम्ह बिनु जग माहीं। मो कहुँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं॥3॥
चौपाई · 4
जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी॥ नाथ सकल सुख साथ तुम्हारें। सरद बिमल बिधु बदनु निहारें॥4॥
दोहा · 65
खग मृग परिजन नगरु बनु बलकल बिमल दुकूल। नाथ साथ सुरसदन सम परनसाल सुख मूल॥65॥
चौपाई · 1
बनदेबीं बनदेव उदारा। करिहहिं सासु ससुर सम सारा॥ कुस किसलय साथरी सुहाई। प्रभु सँग मंजु मनोज तुराई॥1॥
चौपाई · 2
कंद मूल फल अमिअ अहारू। अवध सौध सत सरिस पहारू॥ छिनु-छिनु प्रभु पद कमल बिलोकी। रहिहउँ मुदित दिवस जिमि कोकी॥2॥
चौपाई · 3
बन दुख नाथ कहे बहुतेरे। भय बिषाद परिताप घनेरे॥ प्रभु बियोग लवलेस समाना। सब मिलि होहिं न कृपानिधाना॥3॥
चौपाई · 4
अस जियँ जानि सुजान सिरोमनि। लेइअ संग मोहि छाड़िअ जनि॥ बिनती बहुत करौं का स्वामी। करुनामय उर अंतरजामी॥4॥
दोहा · 66
राखिअ अवध जो अवधि लगि रहत न जनिअहिं प्रान। दीनबंधु सुंदर सुखद सील सनेह निधान॥66॥
चौपाई · 1
मोहि मग चलत न होइहि हारी। छिनु छिनु चरन सरोज निहारी॥ सबहि भाँति पिय सेवा करिहौं। मारग जनित सकल श्रम हरिहौं॥1॥
चौपाई · 2
पाय पखारि बैठि तरु छाहीं। करिहउँ बाउ मुदित मन माहीं॥ श्रम कन सहित स्याम तनु देखें। कहँ दुख समउ प्रानपति पेखें॥2॥
चौपाई · 3
सम महि तृन तरुपल्लव डासी। पाय पलोटिहि सब निसि दासी॥ बार बार मृदु मूरति जोही। लागिहि तात बयारि न मोही॥3॥
चौपाई · 4
को प्रभु सँग मोहि चितवनिहारा। सिंघबधुहि जिमि ससक सिआरा॥ मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू। तुम्हहि उचित तप मो कहुँ भोगू॥4॥
दोहा · 67
ऐसेउ बचन कठोर सुनि जौं न हृदउ बिलगान। तौ प्रभु बिषम बियोग दुख सहिहहिं पावँर प्रान॥67॥
चौपाई · 1
अस कहि सीय बिकल भइ भारी। बचन बियोगु न सकी सँभारी॥ देखि दसा रघुपति जियँ जाना। हठि राखें नहिं राखिहि प्राना॥1॥
चौपाई · 2
कहेउ कृपाल भानुकुलनाथा। परिहरि सोचु चलहु बन साथा॥ नहिं बिषाद कर अवसरु आजू। बेगि करहु बन गवन समाजू॥2॥
चौपाई · 3
कहि प्रिय बचन प्रिया समुझाई। लगे मातु पद आसिष पाई॥ बेगि प्रजा दुख मेटब आई। जननी निठुर बिसरि जनि जाई॥3॥
चौपाई · 4
फिरिहि दसा बिधि बहुरि कि मोरी। देखिहउँ नयन मनोहर जोरी। सुदिन सुघरी तात कब होइहि। जननी जिअत बदन बिधु जोइहि॥4॥
दोहा · 68
बहुरि बच्छ कहि लालु कहि रघुपति रघुबर तात। कबहिं बोलाइ लगाइ हियँ हरषि निरखिहउँ गात॥68॥
चौपाई · 1
लखि सनेह कातरि महतारी। बचनु न आव बिकल भइ भारी॥ राम प्रबोधु कीन्ह बिधि नाना। समउ सनेहु न जाइ बखाना॥1॥
चौपाई · 2
तब जानकी सासु पग लागी। सुनिअ माय मैं परम अभागी॥ सेवा समय दैअँ बनु दीन्हा। मोर मनोरथु सफल न कीन्हा॥2॥
चौपाई · 3
तजब छोभु जनि छाड़िअ छोहू। करमु कठिन कछु दोसु न मोहू॥ सुनिसिय बचन सासु अकुलानी। दसा कवनि बिधि कहौं बखानी॥3॥
चौपाई · 4
बारहिं बार लाइ उर लीन्ही। धरि धीरजु सिख आसिष दीन्ही॥ अचल होउ अहिवातु तुम्हारा। जब लगि गंग जमुन जल धारा॥4॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।