अरण्यकाण्ड · 08
शूर्पणखा की कथा, शूर्पणखा का खरदूषण के पास जाना और खरदूषणादि का वध
अरण्यकाण्ड का प्रकरण 8: शूर्पणखा की कथा, शूर्पणखा का खरदूषण के पास जाना और खरदूषणादि का वध। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 16
बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम। तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम॥16॥
चौपाई · 1
भगति जोग सुनि अति सुख पावा। लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा॥ एहि बिधि कछुक दिन बीती। कहत बिराग ग्यान गुन नीती॥1॥
चौपाई · 2
सूपनखा रावन कै बहिनी। दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी॥ पंचबटी सो गइ एक बारा। देखि बिकल भइ जुगल कुमारा॥2॥
चौपाई · 3
भ्राता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखत नारी॥ होइ बिकल सक मनहि न रोकी। जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी॥3॥
चौपाई · 4
रुचिर रूप धरि प्रभु पहिं जाई। बोली बचन बहुत मुसुकाई॥ तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी। यह सँजोग बिधि रचा बिचारी॥4॥
चौपाई · 5
मम अनुरूप पुरुष जग माहीं। देखेउँ खोजि लोक तिहु नाहीं॥ तातें अब लगि रहिउँ कुमारी। मनु माना कछु तुम्हहि निहारी॥5॥
चौपाई · 6
सीतहि चितइ कही प्रभु बाता। अहइ कुआर मोर लघु भ्राता॥ गइ लछिमन रिपु भगिनी जानी। प्रभु बिलोकि बोले मृदु बानी॥6॥
चौपाई · 7
सुंदरि सुनु मैं उन्ह कर दासा। पराधीन नहिं तोर सुपासा॥ प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा। जो कछु करहिं उनहि सब छाजा॥7॥
चौपाई · 8
सेवक सुख चह मान भिखारी। ब्यसनी धन सुभ गति बिभिचारी॥ लोभी जसु चह चार गुमानी। नभ दुहि दूध चहत ए प्रानी॥8॥
चौपाई · 9
पुनि फिरि राम निकट सो आई। प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई॥ लछिमन कहा तोहि सो बरई। जो तृन तोरि लाज परिहरई॥9॥
चौपाई · 10
तब खिसिआनि राम पहिं गई। रूप भयंकर प्रगटत भई॥ सीतहि सभय देखि रघुराई। कहा अनुज सन सयन बुझाई॥10॥
दोहा · 17
लछिमन अति लाघवँ सो नाक कान बिनु कीन्हि। ताके कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि॥17॥
चौपाई · 1
नाक कान बिनु भइ बिकरारा। जनु स्रव सैल गेरु कै धारा॥ खर दूषन पहिं गइ बिलपाता। धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता॥1॥
चौपाई · 2
तेहिं पूछा सब कहेसि बुझाई। जातुधान सुनि सेन बनाई॥ धाए निसिचर निकर बरूथा। जनु सपच्छ कज्जल गिरि जूथा॥2॥
चौपाई · 3
नाना बाहन नानाकारा। नानायुध धर घोर अपारा॥ सूपनखा आगें करि लीनी। असुभ रूप श्रुति नासा हीनी॥3॥
चौपाई · 4
असगुन अमित होहिं भयकारी। गनहिं न मृत्यु बिबस सब झारी॥ गर्जहिं तर्जहिं गगन उड़ाहीं। देखि कटकु भट अति हरषाहीं॥4॥
चौपाई · 5
कोउ कह जिअत धरहु द्वौ भाई। धरि मारहु तिय लेहु छड़ाई॥ धूरि पूरि नभ मंडल रहा। राम बोलाइ अनुज सन कहा॥5॥
चौपाई · 6
लै जानकिहि जाहु गिरि कंदर। आवा निसिचर कटकु भयंकर॥ रहेहु सजग सुनि प्रभु कै बानी। चले सहित श्री सर धनु पानी॥6॥
चौपाई · 7
देखि राम रिपुदल चलि आवा। बिहसि कठिन कोदंड चढ़ावा॥7॥
छन्द
कोदंड कठिन चढ़ाइ सिर जट जूट बाँधत सोह क्यों। मरकत सयल पर लरत दामिनि कोटि सों जुग भुजग ज्यों॥ कटि कसि निषंग बिसाल भुज गहि चाप बिसिख सुधारि कै। चितवत मनहुँ मृगराज प्रभु गजराज घटा निहारि कै॥
सोरठा · 18
आइ गए बगमेल धरहु धरहु धावत सुभट। जथा बिलोकि अकेल बाल रबिहि घेरत दनुज॥18॥
चौपाई · 1
प्रभु बिलोकि सर सकहिं न डारी। थकित भई रजनीचर धारी॥ सचिव बोलि बोले खर दूषन। यह कोउ नृपबालक नर भूषन॥1॥
चौपाई · 2
नाग असुर सुर नर मुनि जेते। देखे जिते हते हम केते॥ हम भरि जन्म सुनहु सब भाई। देखी नहिं असि सुंदरताई॥2॥
चौपाई · 3
जद्यपि भगिनी कीन्हि कुरूपा। बध लायक नहिं पुरुष अनूपा॥ देहु तुरत निज नारि दुराई। जीअत भवन जाहु द्वौ भाई॥3॥
चौपाई · 4
मोर कहा तुम्ह ताहि सुनावहु। तासु बचन सुनि आतुर आवहु॥ दूतन्ह कहा राम सन जाई। सुनत राम बोले मुसुकाई॥4॥
चौपाई · 5
हम छत्री मृगया बन करहीं। तुम्ह से खल मृग खोजत फिरहीं॥ रिपु बलवंत देखि नहिं डरहीं। एक बार कालहु सन लरहीं॥5॥
चौपाई · 6
जद्यपि मनुज दनुज कुल घालक। मुनि पालक खल सालक बालक॥ जौं न होइ बल घर फिरि जाहू। समर बिमुख मैं हतउँ न काहू॥6॥
चौपाई · 7
रन चढ़ि करिअ कपट चतुराई। रिपु पर कृपा परम कदराई॥ दूतन्ह जाइ तुरत सब कहेऊ। सुनि खर दूषन उर अति दहेऊ॥7॥
छन्द
उर दहेउ कहेउ कि धरहु धाए बिकट भट रजनीचरा। सर चाप तोमर सक्ति सूल कृपान परिघ परसु धरा॥ प्रभु कीन्हि धनुष टकोर प्रथम कठोर घोर भयावहा। भए बधिर ब्याकुल जातुधान न ग्यान तेहि अवसर रहा॥
दोहा
सावधान होइ धाए जानि सबल आराति। लागे बरषन राम पर अस्त्र सस्त्र बहुभाँति॥19 क॥
दोहा
तिन्ह के आयुध तिल सम करि काटे रघुबीर। तानि सरासन श्रवन लगि पुनि छाँड़े निज तीर॥19 ख॥
छन्द · 1
तब चले बान कराल। फुंकरत जनु बहु ब्याल॥ कोपेउ समर श्रीराम। चले बिसिख निसित निकाम॥1॥
छन्द · 2
अवलोकि खरतर तीर। मुरि चले निसिचर बीर॥ भए क्रुद्ध तीनिउ भाइ। जो भागि रन ते जाइ॥2॥
छन्द · 3
तेहि बधब हम निज पानि। फिरे मरन मन महुँ ठानि॥ आयुध अनेक प्रकार। सनमुख ते करहिं प्रहार॥3॥
छन्द · 4
रिपु परम कोपे जानि। प्रभु धनुष सर संधानि॥ छाँड़े बिपुल नाराच। लगे कटन बिकट पिसाच॥4॥
छन्द · 5
उर सीस भुज कर चरन। जहँ तहँ लगे महि परन॥ चिक्करत लागत बान। धर परत कुधर समान॥5॥
छन्द · 6
भट कटत तन सत खंड। पुनि उठत करि पाषंड॥ नभ उड़त बहु भुज मुंड। बिनु मौलि धावत रुंड॥6॥
छन्द · 7
खग कंक काक सृगाल। कटकटहिं कठिन कराल॥7॥
छन्द · 1
कटकटहिं जंबुक भूत प्रेत पिसाच खर्पर संचहीं। बेताल बीर कपाल ताल बजाइ जोगिनि नंचहीं॥ रघुबीर बान प्रचंड खंडहिं भटन्ह के उर भुज सिरा। जहँ तहँ परहिं उठि लरहिं धर धरु धरु करहिं भयंकर गिरा॥1॥
छन्द · 2
अंतावरीं गहि उड़त गीध पिसाच कर गहि धावहीं। संग्राम पुर बासी मनहुँ बहु बाल गुड़ी उड़ावहीं॥ मारे पछारे उर बिदारे बिपुल भट कहँरत परे। अवलोकि निज दल बिकल भट तिसिरादि खर दूषन फिरे॥2॥
छन्द · 3
सरसक्ति तोमर परसु सूल कृपान एकहि बारहीं। करि कोप श्री रघुबीर पर अगनित निसाचर डारहीं॥ प्रभु निमिष महुँ रिपु सर निवारि पचारि डारे सायका। दस दस बिसिख उर माझ मारे सकल निसिचर नायका॥3॥
छन्द · 4
महि परत उठि भट भिरत मरत न करत माया अति घनी। सुर डरत चौदह सहस प्रेत बिलोकि एक अवध धनी॥ सुर मुनि सभय प्रभु देखि मायानाथ अति कौतुक कर्यो। देखहिं परसपर राम करि संग्राम रिपु दल लरि मर्यो॥4॥
दोहा
राम राम कहि तनु तजहिं पावहिं पद निर्बान। करि उपाय रिपु मारे छन महुँ कृपानिधान॥20 क॥
दोहा
हरषित बरषहिं सुमन सुर बाजहिं गगन निसान। अस्तुति करि करि सब चले सोभित बिबिध बिमान॥20 ख॥
चौपाई · 1
जब रघुनाथ समर रिपु जीते। सुर नर मुनि सब के भय बीते॥ तब लछिमन सीतहि लै आए। प्रभु पद परत हरषि उर लाए॥1॥
चौपाई · 2
सीता चितव स्याम मृदु गाता। परम प्रेम लोचन न अघाता॥पंचबटीं बसि श्री रघुनायक। करत चरित सुर मुनि सुखदायक॥2॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।