अरण्यकाण्ड · 06
राक्षस वध की प्रतिज्ञा करना, सुतीक्ष्णजी का प्रेम, अगस्त्य मिलन, अगस्त्य संवाद
अरण्यकाण्ड का प्रकरण 6: राक्षस वध की प्रतिज्ञा करना, सुतीक्ष्णजी का प्रेम, अगस्त्य मिलन, अगस्त्य संवाद। गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।
दोहा · 9
निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह। सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह॥9॥
चौपाई · 1
मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना। नाम सुतीछन रति भगवाना॥ मन क्रम बचन राम पद सेवक। सपनेहुँ आन भरोस न देवक॥1॥
चौपाई · 2
प्रभु आगवनु श्रवन सुनि पावा। करत मनोरथ आतुर धावा॥ हे बिधि दीनबंधु रघुराया। मो से सठ पर करिहहिं दाया॥2॥
चौपाई · 3
सहित अनुज मोहि राम गोसाईं। मिलिहहिं निज सेवक की नाईं॥ मोरे जियँ भरोस दृढ़ नाहीं। भगति बिरति न ग्यान मन माहीं॥3॥
चौपाई · 4
नहिं सतसंग जोग जप जागा। नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा॥ एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाकें गति न आन की॥4॥
चौपाई · 5
होइहैं सुफल आजु मम लोचन। देखि बदन पंकज भव मोचन॥ निर्भर प्रेम मगन मुनि ग्यानी। कहि न जाइ सो दसा भवानी॥5॥
चौपाई · 6
दिसि अरु बिदिसि पंथ नहिं सूझा। को मैं चलेउँ कहाँ नहिं बूझा॥ कबहुँक फिरि पाछें पुनि जाई। कबहुँक नृत्य करइ गुन गाई॥6॥
चौपाई · 7
अबिरल प्रेम भगति मुनि पाई। प्रभु देखैं तरु ओट लुकाई॥ अतिसय प्रीति देखि रघुबीरा। प्रगटे हृदयँ हरन भव भीरा॥7॥
चौपाई · 8
मुनि मग माझ अचल होइ बैसा। पुलक सरीर पनस फल जैसा॥ तब रघुनाथ निकट चलि आए। देखि दसा निज जन मन भाए॥8॥
चौपाई · 9
मुनिहि राम बहु भाँति जगावा। जाग न ध्यान जनित सुख पावा॥ भूप रूप तब राम दुरावा। हृदयँ चतुर्भुज रूप देखावा॥9॥
चौपाई · 10
मुनि अकुलाइ उठा तब कैसें। बिकल हीन मनि फनिबर जैसें॥ आगें देखि राम तन स्यामा। सीता अनुज सहित सुख धामा॥10॥
चौपाई · 11
परेउ लकुट इव चरनन्हि लागी। प्रेम मगन मुनिबर बड़भागी॥ भुज बिसाल गहि लिए उठाई। परम प्रीति राखे उर लाई॥11॥
चौपाई · 12
मुनिहि मिलत अस सोह कृपाला। कनक तरुहि जनु भेंट तमाला॥ राम बदनु बिलोक मुनि ठाढ़ा। मानहुँ चित्र माझ लिखि काढ़ा॥12॥
दोहा · 10
तब मुनि हृदयँ धीर धरि गहि पद बारहिं बार। निज आश्रम प्रभु आनि करि पूजा बिबिध प्रकार॥10॥
चौपाई · 1
कह मुनि प्रभु सुनु बिनती मोरी। अस्तुति करौं कवन बिधि तोरी॥ महिमा अमित मोरि मति थोरी। रबि सन्मुख खद्योत अँजोरी॥1॥
चौपाई · 2
श्याम तामरस दाम शरीरं। जटा मुकुट परिधन मुनिचीरं॥ पाणि चाप शर कटि तूणीरं। नौमि निरंतर श्रीरघुवीरं॥2॥
चौपाई · 3
मोह विपिन घन दहन कृशानुः। संत सरोरुह कानन भानुः॥ निसिचर करि वरूथ मृगराजः। त्रातु सदा नो भव खग बाजः॥3॥
चौपाई · 4
अरुण नयन राजीव सुवेशं। सीता नयन चकोर निशेशं॥ हर हृदि मानस बाल मरालं। नौमि राम उर बाहु विशालं॥4॥
चौपाई · 5
संशय सर्प ग्रसन उरगादः। शमन सुकर्कश तर्क विषादः॥ भव भंजन रंजन सुर यूथः। त्रातु सदा नो कृपा वरूथः॥5॥
चौपाई · 6
निर्गुण सगुण विषम सम रूपं। ज्ञान गिरा गोतीतमनूपं॥ अमलमखिलमनवद्यमपारं। नौमि राम भंजन महि भारं॥6॥
चौपाई · 7
भक्त कल्पपादप आरामः। तर्जन क्रोध लोभ मद कामः॥ अति नागर भव सागर सेतुः। त्रातु सदा दिनकर कुल केतुः॥7॥
चौपाई · 8
अतुलित भुज प्रताप बल धामः। कलि मल विपुल विभंजन नामः॥ धर्म वर्म नर्मद गुण ग्रामः। संतत शं तनोतु मम रामः॥8॥
चौपाई · 9
जदपि बिरज ब्यापक अबिनासी। सब के हृदयँ निरंतर बासी॥ तदपि अनुज श्री सहित खरारी। बसतु मनसि मम काननचारी॥9॥
चौपाई · 10
जे जानहिं ते जानहुँ स्वामी। सगुन अगुन उर अंतरजामी॥ जो कोसलपति राजिव नयना। करउ सो राम हृदय मम अयना॥10॥
चौपाई · 11
अस अभिमान जाइ जनि भोरे। मैं सेवक रघुपति पति मोरे॥ सुनि मुनि बचन राम मन भाए। बहुरि हरषि मुनिबर उर लाए॥11॥
चौपाई · 12
परम प्रसन्न जानु मुनि मोही। जो बर मागहु देउँ सो तोही॥ मुनि कह मैं बर कबहुँ न जाचा। समुझि न परइ झूठ का साचा॥12॥
चौपाई · 13
तुम्हहि नीक लागै रघुराई। सो मोहि देहु दास सुखदाई॥ अबिरल भगति बिरति बिग्याना। होहु सकल गुन ग्यान निधाना॥13॥
चौपाई · 14
प्रभु जो दीन्ह सो बरु मैं पावा। अब सो देहु मोहि जो भावा॥14॥
दोहा · 11
अनुज जानकी सहित प्रभु चाप बान धर राम। मम हिय गगन इंदु इव बसहु सदा निहकाम॥11॥
चौपाई · 1
एवमस्तु करि रमानिवासा। हरषि चले कुंभज रिषि पासा॥ बहुत दिवस गुर दरसनु पाएँ। भए मोहि एहिं आश्रम आएँ॥1॥
चौपाई · 2
अब प्रभु संग जाउँ गुर पाहीं। तुम्ह कहँ नाथ निहोरा नाहीं॥ देखि कृपानिधि मुनि चतुराई। लिए संग बिहसे द्वौ भाई॥2॥
चौपाई · 3
पंथ कहत निज भगति अनूपा। मुनि आश्रम पहुँचे सुरभूपा॥ तुरत सुतीछन गुर पहिं गयऊ। करि दंडवत कहत अस भयऊ॥3॥
चौपाई · 4
नाथ कोसलाधीस कुमारा। आए मिलन जगत आधारा॥ राम अनुज समेत बैदेही। निसि दिनु देव जपत हहु जेही॥4॥
चौपाई · 5
सुनत अगस्ति तुरत उठि धाए। हरि बिलोकि लोचन जल छाए॥ मुनि पद कमल परे द्वौ भाई। रिषि अति प्रीति लिए उर लाई॥5॥
चौपाई · 6
सादर कुसल पूछि मुनि ग्यानी। आसन बर बैठारे आनी॥ पुनि करि बहु प्रकार प्रभु पूजा। मोहि सम भाग्यवंत नहिं दूजा॥6॥
चौपाई · 7
जहँ लगि रहे अपर मुनि बृंदा। हरषे सब बिलोकि सुखकंदा॥7॥
दोहा · 12
मुनि समूह महँ बैठे सन्मुख सब की ओर। सरद इंदु तन चितवन मानहुँ निकर चकोर॥12॥
चौपाई · 1
तब रघुबीर कहा मुनि पाहीं। तुम्ह सन प्रभु दुराव कछु नाहीं॥ तुम्ह जानहु जेहि कारन आयउँ। ताते तात न कहि समुझायउँ॥1॥
चौपाई · 2
अब सो मंत्र देहु प्रभु मोही। जेहि प्रकार मारौं मुनिद्रोही॥ मुनि मुसुकाने सुनि प्रभु बानी। पूछेहु नाथ मोहि का जानी॥2॥
चौपाई · 3
तुम्हरेइँ भजन प्रभाव अघारी। जानउँ महिमा कछुक तुम्हारी॥ ऊमरि तरु बिसाल तव माया। फल ब्रह्मांड अनेक निकाया॥3॥
चौपाई · 4
जीव चराचर जंतु समाना। भीतर बसहिं न जानहिं आना॥ ते फल भच्छक कठिन कराला। तव भयँ डरत सदा सोउ काला॥4॥
चौपाई · 5
ते तुम्ह सकल लोकपति साईं। पूँछेहु मोहि मनुज की नाईं॥ यह बर मागउँ कृपानिकेता। बसहु हृदयँ श्री अनुज समेता॥5॥
चौपाई
अबिरल भगति बिरति सतसंगा। चरन सरोरुह प्रीति अभंगा॥ जद्यपि ब्रह्म अखंड अनंता। अनुभव गम्य भजहिं जेहि संता।6॥
चौपाई · 7
अस तव रूप बखानउँ जानउँ। फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ॥ संतत दासन्ह देहु बड़ाई। तातें मोहि पूँछेहु रघुराई॥7॥
चौपाई · 8
है प्रभु परम मनोहर ठाऊँ। पावन पंचबटी तेहि नाऊँ॥ दंडक बन पुनीत प्रभु करहू। उग्र साप मुनिबर कर हरहू॥8॥
चौपाई · 9
बास करहु तहँ रघुकुल राया। कीजे सकल मुनिन्ह पर दाया॥ चले राम मुनि आयसु पाई। तुरतहिं पंचबटी निअराई॥9॥
गोस्वामी तुलसीदास के मूल पद।