अध्याय 09 · 34 श्लोक
अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
राजविद्याराजगुह्ययोग
भगवद गीता का नौवां अध्याय राजविद्याराजगुह्ययोग है। इस अध्याय में, कृष्ण समझाते हैं कि वह सर्वोच्च हैं और यह भौतिक संसार उनकी योगमाया द्वारा रचित और खंडित होता रहता है अथवा मनुष्य उनकी देखरेख में आते जाते रहते हैं। वे हमारी आध्यात्मिक जागरूकता के प्रति भक्ति की भूमिका और महत्व का वर्णन करते हैं। ऐसी भक्ति में मनुष्य को भगवन के लिए ही जीवित रहना चाहिए, अपना सर्वस्व भगवन को ही समर्पित करना चाहिए और सबकुछ भगवन के लिए ही करना चाहिए। जो इस प्रकार की भक्ति का अनुसरण करता है वह इस भौतिक संसार के बंधनों से मुक्त हो जाता है और भगवान के साथ एकजुट हो जाता है।
श्लोक · 1
(श्रीभगवानुवाच)
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥९-१॥
श्रीभगवान् ने कहा — तुम अनसूयु के लिए मैं इस गुह्यतम ज्ञान को विज्ञान के सहित कहूँगा, जिसको जानकर तुम अशुभ से मुक्त हो जाओगे।।
श्लोक · 2
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥९-२॥
यह ज्ञान राजविद्या और राजगुह्य (सब गुह्यों अर्थात् रहस्यों का राजा) एवं पवित्र, उत्तम, प्रत्यक्ष ज्ञानवाला और धर्मयुक्त है, तथा करने में सरल और अव्यय है।।
श्लोक · 3
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥९-३॥
हे परन्तप ! इस धर्म में श्रद्धारहित पुरुष मुझे प्राप्त न होकर मृत्युरूपी संसार में रहते हैं।।
श्लोक · 4
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥९-४॥
यह सम्पूर्ण जगत् मुझ के अव्यक्त स्वरूप से व्याप्त है; भूतमात्र मुझमें स्थित है, परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूं।।
श्लोक · 5
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥९-५॥
और भूतमात्र मुझ में स्थित नहीं है; मेरे ईश्वरीय योग को देखो कि भूतों को धारण करने वाली और भूतों को उत्पन्न करने वाली मेरी आत्मा उन भूतों में स्थित नहीं है।।
श्लोक · 6
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥९-६॥
जैसे सर्वत्र विचरण करने वाली महान् वायु सदा आकाश में स्थित रहती हैं, वैसे ही सम्पूर्ण भूत मुझमें स्थित हैं, ऐसा तुम जानो।।
श्लोक · 7
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥९-७॥
हे कौन्तेय ! कल्प के अन्त में समस्त भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं; और कल्प के प्रारम्भ में उनको मैं फिर रचता हूँ।।
श्लोक · 8
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥९-८॥
प्रकृति को अपने वश में करके (अर्थात् उसे चेतनता प्रदान कर) स्वभाव के वश से परतन्त्र हुए इस सम्पूर्ण भूत समुदाय को मैं पुन:-पुन: रचता हूँ।।
श्लोक · 9
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥९-९॥
हे धनंजय ! उन कर्मों में आसक्ति रहित और उदासीन के समान स्थित मुझ को वे कर्म नहीं बांधते हैं।।
श्लोक · 10
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥९-१०॥
हे कौन्तेय ! मुझ अध्यक्ष के कारण प्रकृति चराचर जगत् को उत्पन्न करती है; इस कारण यह जगत् घूमता रहता है।।
श्लोक · 11
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥९-११॥
समस्त भूतों के महान् ईश्वर रूप मेरे परम भाव को नहीं जानते हुए मूढ़ लोग मनुष्य शरीरधारी मुझ परमात्मा का अनादर करते हैं।।
श्लोक · 12
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥९-१२॥
वृथा आशा, वृथा कर्म और वृथा ज्ञान वाले अविचारीजन राक्षसों के और असुरों के मोहित करने वाले स्वभाव को धारण किये रहते हैं।।
श्लोक · 13
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥९-१३॥
हे पार्थ ! परन्तु दैवी प्रकृति के आश्रित महात्मा पुरुष मुझे समस्त भूतों का आदिकारण और अव्ययस्वरूप जानकर अनन्यमन से युक्त होकर मुझे भजते हैं।।
श्लोक · 14
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥९-१४॥
सतत मेरा कीर्तन करते हुए, प्रयत्नशील, दढ़व्रती पुरुष मुझे नमस्कार करते हुए, नित्ययुक्त होकर भक्तिपूर्वक मेरी उपासना करते हैं।।
श्लोक · 15
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥९-१५॥
कोई मुझे ज्ञानयज्ञ के द्वारा पूजन करते हुए एकत्वभाव से उपासते हैं, कोई पृथक भाव से, कोई बहुत प्रकार से मुझ विराट स्वरूप को उपासते हैं।।
श्लोक · 16
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥९-१६॥
मैं ऋक्रतु हूँ; मैं यज्ञ हूँ; स्वधा और औषध मैं हूँ, मैं मन्त्र हूँ, घी हूँ, मैं अग्नि हूँ और हुतं अर्थात् हवन कर्म मैं हूँ।।
श्लोक · 17
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च ॥९-१७॥
मैं ही इस जगत् का पिता, माता, धाता और पितामह हूँमैं वेद्य वस्तु हूँ, पवित्र, ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ।।
श्लोक · 18
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥९-१८॥
गति, भरण-पोषण करने वाला, प्रभु, साक्षी, निवास, शरणस्थान तथा मित्र और उत्पत्ति, प्रलयरूप तथा स्थान, निधान और अव्यय कारण भी मैं हूँ।।
श्लोक · 19
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥९-१९॥
हे अर्जुन ! मैं ही तपता हूँ; मैं वर्षा का निग्रह और उत्सर्जन करता हूँ। मैं ही अमृत और मृत्यु एवं सत् और असत् हूँ।।
श्लोक · 20
त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक- मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥९-२०॥
तीनों वेदों के ज्ञाता, सोमपान करने वाले एवं पापों से पवित्र हुए पुरुष मुझे यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग प्राप्ति चाहते हैं; वे पुरुष अपने पुण्यों के फलरूप इन्द्रलोक को प्राप्त कर स्वर्ग में दिव्य देवताओं के भोग भोगते हैं।।
श्लोक · 21
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥९-२१॥
वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर, पुण्यक्षीण होने पर, मृत्युलोक को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार तीनों वेदों में कहे गये कर्म के शरण हुए और भोगों की कामना वाले पुरुष आवागमन को प्राप्त होते हैं।।
श्लोक · 22
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥९-२२॥
अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ।।
श्लोक · 23
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥९-२३॥
हे कौन्तेय ! श्रद्धा से युक्त जो भक्त अन्य देवताओं को पूजते हैं, वे भी मुझे ही अविधिपूर्वक पूजते हैं।।
श्लोक · 24
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥९-२४॥
क्योंकि सब यज्ञों का भोक्ता और स्वामी मैं ही हूँ, परन्तु वे मुझे तत्त्वत: नहीं जानते हैं, इसलिए वे गिरते हैं, अर्थात् संसार को प्राप्त होते हैं।।
श्लोक · 25
यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥९-२५॥
देवताओं के पूजक देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरपूजक पितरों को जाते हैं, भूतों का यजन करने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मुझे पूजने वाले भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।।
श्लोक · 26
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥९-२६॥
जो कोई भी भक्त मेरे लिए पत्र, पुष्प, फल, जल आदि भक्ति से अर्पण करता है, उस शुद्ध मन के भक्त का वह भक्तिपूर्वक अर्पण किया हुआ मैं भोगता हूँ अर्थात् स्वीकार करता हूँ।।
श्लोक · 27
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥९-२७॥
हे कौन्तेय ! तुम जो कुछ कर्म करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ हवन करते हो, जो कुछ दान देते हो और जो कुछ तप करते हो, वह सब तुम मुझे अर्पण करो।।
श्लोक · 28
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥९-२८॥
इस प्रकार तुम शुभाशुभ फलस्वरूप कर्मबन्धनों से मुक्त हो जाओगे; और संन्यासयोग से युक्तचित्त हुए तुम विमुक्त होकर मुझे ही प्राप्त हो जाओगे।।
श्लोक · 29
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥९-२९॥
मैं समस्त भूतों में सम हूँ; न कोई मुझे अप्रिय है और न प्रिय; परन्तु जो मुझे भक्तिपूर्वक भजते हैं, वे मुझमें और मैं भी उनमें हूँ।।
श्लोक · 30
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥९-३०॥
यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भक्त होकर मुझे भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है।।
श्लोक · 31
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥९-३१॥
हे कौन्तेय, वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है। तुम निश्चयपूर्वक सत्य जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।।
श्लोक · 32
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥९-३२॥
हे पार्थ ! स्त्री, वैश्य और शूद्र ये जो कोई पापयोनि वाले हों, वे भी मुझ पर आश्रित होकर परम गति को प्राप्त होते हैं।।
श्लोक · 33
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥९-३३॥
फिर क्या कहना है कि पुण्यशील ब्राह्मण और राजर्षि भक्तजन ; इस अनित्य और सुखरहित लोक को प्राप्त होकर तुम भक्तिपूर्वक मेरी ही पूजा करो।।
श्लोक · 34
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥९-३४॥
मुझमें स्थिर मन वाले बनो; मेरे भक्त और मेरे पूजन करने वाले बनो; मुझे नमस्कार करो; इस प्रकार मत्परायण (अर्थात् मैं ही जिसका परम लक्ष्य हूँ ऐसे) होकर आत्मा को मुझसे युक्त करके तुम मुझे ही प्राप्त होओगे।।
छवि: कुरुक्षेत्र मंदिर में कृष्ण–अर्जुन मूर्ति (CC BY-SA 2.0)।