अध्याय 07 · 30 श्लोक
अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञानयोग
ज्ञानविज्ञानयोग
भगवद गीता का सातवा अध्याय ज्ञानविज्ञानयोग है। इस अध्याय में कृष्ण बताते हैं कि वह सर्वोच्च सत्य हैं एवं हर चीज़ के मुख्य कारण हैं। वे इस भौतिक संसार में अपनी भ्रामक ऊर्जा - योगमाया के बारे में बताते हैं अथवा प्रकट करते हैं कि इस ऊर्जा पर काबू पाना साधारण मनुष्य के लिए कितना कठिन है परन्तु जो मनुष्य अपने मन को परमात्मा में लीन कर लेते हैं वे इस माया को जीत लेते हैं और उन्हे आसानी से प्राप्त कर लेते हैं। वे उन चार प्रकार के लोगों का भी वर्णन करते हैं जो भक्ति में लीन होकर उनको आत्मसमर्पण करते हैं अथवा वे चार प्रकार जो नहीं करते। कृष्ण पुष्टि करते हैं कि वे ही परम सत्य हैं। जो लोग इस सत्य को समझ लेते हैं, वे आध्यात्मिक प्राप्ति के शिखर पर पहुंच जाते हैं और भगवान को प्राप्त कर लेते हैं।
श्लोक · 1
(श्रीभगवानुवाच)
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥७-१॥
हे पार्थ ! मुझमें असक्त हुए मन वाले तथा मदाश्रित होकर योग का अभ्यास करते हुए जिस प्रकार तुम मुझे समग्ररूप से, बिना किसी संशय के, जानोगे वह सुनो।।
श्लोक · 2
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥७-२॥
मैं तुम्हारे लिए विज्ञान सहित इस ज्ञान को अशेष रूप से कहूँगा जिसको जानकर यहाँ फिर और कुछ जानने योग्य शेष नहीं रह जाता है।।
श्लोक · 3
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥७-३॥
सहस्रों मनुष्यों में कोई ही मनुष्य पूर्णत्व की सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है और उन प्रयत्नशील साधकों में भी कोई ही पुरुष मुझे तत्त्व से जानता है।।
श्लोक · 4
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥७-४॥
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तथा मन, बुद्धि और अहंकार - यह आठ प्रकार से विभक्त हुई मेरी प्रकृति है।।
श्लोक · 5
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥७-५॥
हे महाबाहो ! यह अपरा प्रकृति है। इससे भिन्न मेरी जीवरूपी पराप्रकृति को जानो, जिससे यह जगत् धारण किया जाता है।।
श्लोक · 6
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥७-६॥
यह जानो कि समम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियों से उत्पत्ति वाले हैं। मैं सम्पूर्ण जगत् का उत्पत्ति तथा प्रलय स्थान हूँ।।
श्लोक · 7
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥७-७॥
हे धनंजय ! मुझसे श्रेष्ठ अन्य किचिन्मात्र वस्तु नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् सूत्र में मणियों के सदृश मुझमें पिरोया हुआ है।।
श्लोक · 8
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥७-८॥
हे कौन्तेय ! जल में मैं रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, सब वेदों में प्रणव हूँ तथा आकाश में शब्द और पुरुषों में पुरुषत्व हूँ।।
श्लोक · 9
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥७-९॥
पृथ्वी में पवित्र गन्ध हूँ और अग्नि में तेज हूँ; सम्पूर्ण भूतों में जीवन हूँ और तपस्वियों में मैं तप हूँ।।
श्लोक · 10
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥७-१०॥
हे पार्थ ! सम्पूर्ण भूतों का सनातन बीज मुझे ही जानो; मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ।।
श्लोक · 11
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥७-११॥
हे भरत श्रेष्ठ ! मैं बलवानों का कामना तथा आसक्ति से रहित बल हूँ और सब भूतों में धर्म के अविरुद्ध अर्थात् अनुकूल काम हूँ।।
श्लोक · 12
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥७-१२॥
जो भी सात्त्विक, राजसिक और तामसिक भाव हैं, उन सबको तुम मेरे से उत्पन्न हुए जानो; तथापि मैं उनमें नहीं हूँ, वे मुझमें हैं।।
श्लोक · 13
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥७-१३॥
त्रिगुणों से उत्पन्न इन भावों से सम्पूर्ण जगत् मोहित हुआ इन से परे अव्यय स्वरूप मुझे नहीं जानता है।।
श्लोक · 14
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥७-१४॥
यह दैवी त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है। परन्तु जो मेरी शरण में आते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।।
श्लोक · 15
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥७-१५॥
दुष्कृत्य करने वाले, मूढ, नराधम पुरुष मुझे नहीं भजते हैं; माया के द्वारा जिनका ज्ञान हर लिया गया है, वे आसुरी भाव को धारण किये रहते हैं।।
श्लोक · 16
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥७-१६॥
हे भरत श्रेष्ठ अर्जुन ! उत्तम कर्म करने वाले आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी ऐसे चार प्रकार के लोग मुझे भजते हैं।।
श्लोक · 17
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥७-१७॥
उनमें भी मुझ से नित्ययुक्त, अनन्य भक्ति वाला ज्ञानी श्रेष्ठ है, क्योंकि ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह मुझे अत्यन्त प्रिय है।।
श्लोक · 18
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥७-१८॥
ये सब उत्कृष्ट हैं, परन्तु ज्ञानी तो मेरा स्वरूप ही है ऐसा मेरा मत है, क्योंकि वह स्थिर बुद्धि ज्ञानी अति उत्तम गतिस्वरूप मुझमें अच्छी प्रकार स्थित है।।
श्लोक · 19
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥७-१९॥
बहुत जन्मों के अन्त में ज्ञान को प्राप्त होकर कि 'यह सब वासुदेव है' ज्ञानी भक्त मुझे प्राप्त होता है; ऐसा महात्मा अति दुर्लभ है।।
श्लोक · 20
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥७-२०॥
भोगविशेष की कामना से जिनका ज्ञान हर लिया गया है, ऐसे पुरुष अपने स्वभाव से प्रेरित हुए अन्य देवताओं को विशिष्ट नियम का पालन करते हुए भजते हैं।।
श्लोक · 21
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥७-२१॥
जो-जो भक्त जिस-जिस रूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस-उस की मैं उस ही देवता के प्रति श्रद्धा को स्थिर करता हूँ।।
श्लोक · 22
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥७-२२॥
वह उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता का पूजन करता है और उससे मेरे द्वारा विधान किये हुये इच्छित भोगों को नि:सन्देह प्राप्त करता है।।
श्लोक · 23
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥७-२३॥
परन्तु उन अल्प बुद्धि पुरुषों का वह फल नाशवान् होता है। देवताओं के पूजक देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।।
श्लोक · 24
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥७-२४॥
बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम अव्यय परम भाव को न जानते हुए मुझ अव्यक्त को व्यक्त मानते हैं।।
श्लोक · 25
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥७-२५॥
अपनी योगमाया से आवृत्त मैं सबको प्रत्यक्ष नहीं होता हूँ। यह मोहित लोक मुझ जन्मरहित, अविनाशी को नहीं जानता है।।
श्लोक · 26
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥७-२६॥
हे अर्जुन ! पूर्व में व्यतीत हुए और वर्तमान में स्थित तथा भविष्य में होने वाले भूतमात्र को मैं जानता हूँ, परन्तु मुझे कोई भी पुरुष नहीं जानता हैं।।
श्लोक · 27
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥७-२७॥
हे परन्तप भारत ! इच्छा और द्वेष से उत्पन्न द्वन्द्वमोह से भूतमात्र उत्पत्ति काल में ही संमोह को प्राप्त होते हैं।।
श्लोक · 28
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥७-२८॥
परन्तु जिन पुण्यकर्मी पुरुषों का पाप नष्ट हो गया है, वे द्वन्द्वमोह से निर्मुक्त और दृढ़वती पुरुष मुझे भजते हैं।।
श्लोक · 29
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥७-२९॥
जो मेरे शरणागत होकर जरा और मरण से मुक्ति पाने के लिए यत्न करते हैं, वे पुरुष उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को और सम्पूर्ण कर्म को जानते हैं।।
श्लोक · 30
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥७-३०॥
जो पुरुष अधिभूत और अधिदैव तथा अधियज्ञ के सहित मुझे जानते हैं, वे युक्तचित्त वाले पुरुष अन्तकाल में भी मुझे जानते हैं।।
छवि: कुरुक्षेत्र मंदिर में कृष्ण–अर्जुन मूर्ति (CC BY-SA 2.0)।